झुग्गी बस्तियों की दैनिक घटनाओं, रोजमर्रा की समस्याओं और वास्तविक ख़बरों को दिखाने, लोगों तक लाने का एक मंच है। जिसे शहरी और ग्रामीण गरीब बस्तियों की सच्चाई और वास्तविकता दिखाने के लिए, एक प्रतिबद्ध व्यक्तियों की एक टीम द्वारा प्रबंधित किया जाता है। ताकि स्लम की वास्तविकता को लोगों तक पहुँचाया जा सके।
रविवार, 26 दिसंबर 2021
स्लम, कतरन और रोज़गार : प्रदीप चौहान
बुधवार, 20 अक्टूबर 2021
स्लम युवाओं का अंधकारमय भविष्य: प्रदीप चौहान
बुधवार, 16 सितंबर 2020
बेरोज़गार हो गए अख़बार बाँटने वाले।: प्रदीप चौहान
कोरोना के डर, डिजिटल जुड़ाव और लोक़डाउन के बाद अख़बारों की कम होती माँग की वजह से हज़ारों अख़बार बाँटने वाले, बेरोज़गार हो गए हैं।
सुबह की भोर में जब चकाचौंध दिल्ली, सबसे प्यारी नींद के आग़ोश में सो रही होती है। उसी भोर में कुछ किशोर साइकिल की हैंडल पर टोकरी और थैले लिए निकल जाते हैं अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाने। अख़बारों के थोक मूल्य पर मिलने वाले सेंटरों पर पहुँचकर, अलग अलग कम्पनियों के अख़बार ख़रीदते हैं। मुख्य पन्नो के बीच सप्लिमेंटरी पन्ने भरते हैं। और मालिक की निगरानी मे गिनकर अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी लेकर चल पड़ते हैं।
साइकिल चलाते-चलाते किसी के दरवाज़े तो किसी की बहुमंज़िली बालकनियों में रबड़ से लपेटे अख़बार फेंकते हैं। गिनती के अख़बारों की ज़िम्मेदारी ऐसी की निशाना हमेशा सटीक ही लगता है।
चाहे कड़ाके की ठंड हो या तेज़ बारिश, रविवार हो या कोई राष्ट्रीय अवकाश। दिवाली और होली के बासी दिन के अलावा, इनके लिए कोई छुट्टी नहीं होती।
हर दिन दो से तीन घंटे के काम के बाद, ज़िम्मेदारी और अख़बारों की संख्या के आधार पर 800/- से लेकर 1500/- रुपये तनख़्वाह मिलती है। जिसके लिए ये मेहनती जोशिले नौजवान काम करते हैं।
ज़्यादातर झुग्गी बस्तियों में रहने वाले किशोरों के लिए अख़बार बाँटना मुख्य पार्ट टाइम काम है जिसे करके वो अपने ट्यूशन की फ़ीस देते हैं। अपना जेब ख़र्च चलाते हैं। और परिवार चलाने में आर्थिक मदद करते हैं।
प्रधानमंत्री द्वारा लिए गए शुरुवाती 21 दिन के लॉकडाउन के फ़ैसले के मद्देनज़र नेहरू प्लेस जैसे कई अख़बार सेंटरों के वेंडर्स असोसीशन ने यह फ़ैसला लिया की लॉकडाउन में कोई भी अख़बार का काम नहीं करेगा। सरकार के भारत बंद के फ़ैसले का सम्मान किया जाएगा। और ऐसा ही हुआ।
हालाँकि सरकारों ने अख़बार के काम को “जरुरी सेवा” की श्रेणी में रखा और इ-पास लेकर काम करने की इजाज़त दी। लेकिन हर मोड़, हर चौराहे पर हुए सरकारी नाकाबंदी और रेज़िडेंट वेलफ़ेयर असोसिएशन के द्वारा प्रवेश द्वार बंद कर दिए जाने की वजह से, अख़बार बाँटना मुश्किल हो गया। अनेकों हाउसिंग सोसाइटीस ने बाहरी लोगों का प्रवेश रोक दिया।
दूसरी तरफ़ अख़बार से कोरोना फैलने के पुख़्ता सबूत ना मिलने के डबल्यू॰एच॰ओ॰ के बयान के बावजूद भी, भारी संख्या में मासिक अनुबंध पर अख़बार लेने वालों ने, लेना बंद कर दिया। वेंडर्स ने अख़बारों की संख्या कम होने की वजह से अख़बार डालने वाले लड़कों को निकलना शुरू कर दिया। आज हालात ये है की इनमें से लगभग 80% अख़बार डालने वाले बेरोज़गार हो गए हैं।
नेहरु प्लेस के एक वेंडर “चौहान नियूज सर्विसेज” के अनुसार कोरोना के डर की वजह से लगभग 40% से ज़्यादा रीडर्स ने अख़बार लेना बंद कर दिया है। जिसकी वजह से काम कम हो गया है। इसका असर ये है की वेंडर्स को अपने यहाँ सालों से काम कर रहे लड़कों को मजबूरन निकलना पड़ा है।
अख़बार बाँटने का काम करने वाले एक युवक ने बताया की “ये काम परिवार की आर्थिक मदद और अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए करता था। लोकडाउन की वजह से पिता के पास काम नहीं है और मैं भी बेरोज़गार हो गया हुँ।”
अखबार डिलीवरी का काम करने वाले लोगों की बेरोज़गारी किसी को नहीं दिखती है। जरुरी सेवा की श्रेणी में होने के बावजूद भी न तो राज्य सरकार और न ही केंद्र की तरफ से किसी तरह का राहत दिया गया। बेरोज़गारों का ये तबका किसी भी गिनती में नहीं आता। किसी को इनकी कोई परवाह नहीं।
पुरे दिल्ली में एक सौ से ज़्यादा सेंटर्स हैं जहाँ लगभग सभी अख़बार थोक क़ीमत पर मिलते हैं। हर सेंटर पर लगभग 100 से ज़्यादा वेंडर्स आते थे। हर वेंडर के पास दो से तीन अख़बार बाँटने वाले काम करते थे। और लगभग सभी वेंडर्स ने अपने यहाँ काम करने वालों को मजबूरन हटाया है। हज़ारों की संख्या में अख़बार डालने वाले बेरोज़गार हो गए हैं।
गुरुवार, 18 जुलाई 2019
झुग्गी-बस्तियों में शिक्षा के विकास में दीपालय ने पुरे किये अपने 40 साल
![]() |
| Deepalaya Founders' Day |
शुक्रवार, 1 मार्च 2019
युवाओं के लिए प्रेरणादायक कार्यशाला का आयोजन
शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019
दीपालय व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र ने चलाया कंप्यूटर साक्षरता जागरूकता अभियान
शनिवार, 9 फ़रवरी 2019
सफदरजंग अस्पताल में नाकाफ़ी व्यवस्था: ठिठुरती ठंड में सड़क पर सोने को मजबूर परिजन
नशे की दलदल में डूबता बचपन : प्रदीप चौहान
दिल्ली की स्लम बस्तियों में दस-दस साल के बच्चे, छोटी उम्र में गांजा, शराब व अन्य बुरी आदतों के शिकार हो रहे हैं। जिस उम्र में ज्यादातर बच्चे...
-
एक के बाद दूसरी कोरोना की लगातार दो लहरों का बुरा प्रभाव झुग्गी बस्तियों में देखने को मिलता है। ज्यादातर लोगों की नौकरियां चली ग...
-
ओखला इंडस्ट्रियल एरिया फेस 2 के बीचो बीच बसे छोटे बड़े स्लम बस्तियों में एक बड़ी आबादी बसती है। ऐसी झुग्गी बस्तियाँ जहां एक्सपोर्ट...
-
कोरोना के डर , डिजिटल जुड़ाव और लोक़डाउन के बाद अख़बारों की कम होती माँग की वजह से हज़ारों अख़बार बाँटने वाले , बेरोज़गार...



