रविवार, 26 दिसंबर 2021

स्लम, कतरन और रोज़गार : प्रदीप चौहान

ओखला इंडस्ट्रियल एरिया फेस 2 के बीचो बीच बसे छोटे बड़े स्लम बस्तियों में एक बड़ी आबादी बसती है। ऐसी झुग्गी बस्तियाँ जहां एक्सपोर्ट से निकले हुए कपड़े का कचरा लाया जाता है और उस की वैरायटी और क्वालिटी के आधार पर अलग अलग किया जाता है। अप-साइकलिंग से विभिन्न चिझें तैयार की जाती हैं। रीसाइक्लिंग के लिए आगे भेजा जाता है। इस पूरे प्रोसेस में कतरन की लोडिंग, अनलोडिंग, छटाई, उसकी पैकिंग, सिलाई, बिक्री आदि के प्रोसेस में कुछ लोग जिन्हें कबाड़ी कहा जाता है, स्वरोजगार करते हैं और अपने साथ साथ सैकड़ों लोगों को रोजगार देते हैं जिनमें मुख्यतः अशिक्षित ग़रीब महिलाएं शामिल हैं।

 कपड़े के कचरे के निपटारे से व्यापार

दिल्ली एनसीआर और आसपास के इंडस्ट्री एरिया की एक्सपोर्ट हाउसेस में कपड़े का जो कचरा बच जाता है उस कचरे को संजय कॉलोनी व अन्य कॉलोनियों के कबाड़ी, वजन के हिसाब से उन्हें खरीद लेते हैं। उसके बाद कपड़े की क्वालिटी या कपड़े की किस्म के आधार पर अलग अलग किया जाता है।  
छंटाई करने के बाद अलग-अलग बोरियों में पैक किया जाता है। और इसको बड़े इंडस्ट्रीज जहां पर रीसाइक्लिंग होता है वहां पर बेचा जाता है। एक पर्टिकुलर मार्जिन से ये सारा बिजनेस चलता है। यह प्रोसेस एक तरफ कपड़ों के कचरा का रिसाइकल करने में मदद कर रहा है वहीं दूसरी तरफ कचरे से लोगों के लिए रोजगार पैदा कर रहा है।

 महिलाओं के लिए रोज़गार

आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की महिलाएं जिनकी शिक्षा बहुत कम होती है या उम्र ज्यादा होती है उनके लिए रोजगार का एक बहुत बड़ा साधन है। जिन महिलाओं को उनके शिक्षा की वजह से या उम्र की वजह से या स्किल की वजह से आसपास की कंपनियों में काम नहीं मिल पाता उन महिलाओं के लिए कतरन की छटाई करना एक सहायक रोजगार के रूप में उभरा है। 
इससे महिलाएं अपने परिवार को आर्थिक सपोर्ट कर पाती हैं। बच्चों की परवरिश को उनकी शिक्षा में मदद कर पाती हैं। संजय कॉलोनी और आसपास की कॉलोनियों के लिए रीसाइक्लिंग का यह काम एक बड़े विकल्प के रूप में उभर कर सामने आया है जिससे महिलाओं को बिना किसी क्वालिफिकेशन व सर्टिफिकेट की आवश्यकता के उन्हें काम देता है।
छंटाई का काम करने वाली महिलाओं को दिहाड़ी के रूप में 300 से लेकर ₹400 तक मिलता है। जितने दिन काम करती हैं इतने दिन का पैसा मिलता है। इसमें बहुत ज्यादा बंधन नहीं होता जिसके पास भी माल यानी कतरन आता है उसके पास कर लेती हैं। रोज़ाना या हफ्ते में उनको उनका मेहनताना मिल जाता है।

 पुनर्प्रयोग से स्वरोजगार (livelihood by Upcycling)

कपड़ों के कतरन के टुकड़ों में बड़े बड़े पीस भी होते हैं। बड़े साइज के टुकड़ों को अलग किया जाता है। संजय कॉलोनी और आसपास की कॉलोनियों में घर घर मशीनें बिठाकर लोग कतरन से स्कर्ट, टीशर्ट या अन्य रेडीमेड कपड़े तैयार करते हैं। कई लोग कपड़े की कतरन से दरिया, डोर मैट, बाथ मैट, फ्रीज़ कवर, कपड़े के थैले इत्यादि तैयार करते हैं। 

तैयार माल को थोक में सीलमपुर, गांधी नगर या अन्य जगहों से आए व्यापारियों को थोक रेट में बेच दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में अप-साइकिलिंग से स्वरोजगार को बढ़ावा मिल रहा है और साथ ही साथ रोजगार सृजन से कई परिवारों का पालन पोषण चल रहा है।

 रिसाइक्लिंग में योगदान

कपड़ों के अलग-अलग टुकड़ों को उनकी क्वालिटी और उनकी किस्म के आधार पर उन्हें अलग अलग किया जाता है। और अलग-अलग बोरियों में पैक करके बड़ी-बड़ी रीसाइक्लिंग कंपनियों को बेचा जाता है। वो कंपनियां इनसे धागा बनाती हैं और धागे से दुबारा कपड़ा बनता है। इस तरह से कतरन के रीसाइक्लिंग के प्रोसेस में स्लम कॉलोनियों के लोग बहुत बड़ा योगदान देते हैं।

बुधवार, 20 अक्टूबर 2021

स्लम युवाओं का अंधकारमय भविष्य: प्रदीप चौहान

एक के बाद दूसरी कोरोना की लगातार दो लहरों का बुरा प्रभाव झुग्गी बस्तियों में देखने को मिलता है। ज्यादातर लोगों की नौकरियां चली गई हैं। छोटे-मोटे रोजगार करने वालों के रोजगार ठप पड़ गए हैं। असंगठित मज़दूरों की श्रेणी में आने वाली ज्यादातर आबादी झुग्गी बस्ती में बस्ती है। 
 स्लम युवावों के द्वारा अपने जीवन और करियर को लेकर बनायी गई भविष्य की योजनाएं फेल हो रही हैं। आगे का रास्ता साफ नजर नहीं आता। काम की कमी से परेशान, खाली, बेकार पड़ा नौजवान कई गलत आदतों व नशे का शिकार हो रहा है। 

 नशे के व्यापार का बढ़ना बड़ी समस्या।

स्लम कालोनियों में खुलेआम शराब बेची जाती है। गली गली कच्ची शराब की दुकानें मौजूद हैं। राजनीति, पुलिस और नौकरशाहों की मजबूत सांठ गांठ से नशे का व्यापार फल फूल रहा है। गलियों में गांजा मिलना या बिकना आम बात है। 
एक या दो बार से ज्यादा गांजे का सेवन करने के बाद युथ इस नशे का आदी हो जाता है। पार्कों, सुनसान जगहों पर युवावों के समूह का गांजा पीते हुए दिखना आम नाज़ारा है। 
नशीले पदार्थों का आसानी से उपलब्ध होने की वजह से छोटे छोटे बच्चे भी इसकी तरफ आकर्षित हो रहे हैं। स्लम बस्तियों में बसने वाली भावी पीढ़ी नशे से बर्बाद हो रही है।
 जुआ और सट्टे के बढ़ते साम्राज्य का शिकार हो रहा युवा।

स्लम कालोनियों में नौजवानों का एक बड़ा हुजूम गलियों,  नुक्कड़ों और खाली रास्तों पर इकट्ठा होता है और विभिन्न ऑनलाइन सट्टा एप पर पैसा लगाता है। 
आजकल यह बहुत आम बात है। 10 साल के बच्चे भी इसमें निपुण हैं। एक के बाद एक युवाओं का कई ग्रुप तैयार हो जाते हैं। एक बार पैसा लगाने के बाद वह बार-बार सट्टा लगाते हैं।
 
जिसका नम्बर आ गया वो पार्टी देता है। खुलेआम शराब पी और पिलाई जाती है। देर रात तक इन्हीं ग्रुप में गाली गलौज करने,  आपस में झगड़ते और मारपीट की खबरें आम बात हो गई है। 
इसके अलावा युवाओं के इस नशे का फ़ायदा उठाते हुए कुछ लोकल दबंग या यूं कहें कि ऊपर तक पहुंच रखने वाले लोग, अलग-अलग माध्यमों से सट्टे का एक साम्राज्य चलाते हैं। जिसका शिकार आज की युवा पीढ़ी हो रही है।

 ऑनलाइन गेम से समय की हो रही बर्बादी।

स्कूल जाने वाले छोटे बच्चे हों या कॉलेज जाने वाले नौजवान, सबके लिए मोबाइल ऑनलाइन पढ़ाई के लिए पहली जरूरत बनकर उभरा है। अभिभावकों की निगरानी ना होने की वजह से बच्चों को सोशल मीडिया और गेम्स की तरफ जाने का मौका मिल जाता है। 
चाहे पब्जी हो, फौजी या बात करें हम फ्री फायर की। गलियों में या खाली जगहों पर इकट्ठा होकर दो या दो से ज्यादा नौजवान आपस में प्लेयर्स लेते हैं और गेम खेलते हैं।इसका नशा इस कदर है कि वह पूरे पूरे दिन उसी गेम्स में लगे रहते हैं जबतक कि उनका इंटरनेट डेटा खत्म ना हो जाए। 

गेम्स खेलना एक नशे की तरह उभरा है और युवाओं का कीमती समय जो उनकी पढ़ाई में, फिजिकल एक्टिविटी में या उनके डेवलपमेंट में लगना चाहिए था वह समय यूं ही गेम्स खेल कर बर्बाद हो रहा है।

 शिक्षा संस्थानों के बंद होने का पड़ रहा बुरा प्रभाव।

बच्चों और नौजवानों का ज्यादातर समय कॉलोनियों से बाहर शिक्षा संस्थानों में बीतता था। कोरोना महामारी की लगातार दो लहरों और लॉकडाउन की वजह से ज्यादातर शिक्षा संस्थान बंद हैं। बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई तो चल रही है लेकिन डिवाइसेज और दूसरे रिसोर्सेज की कमी है। 

एक घर में दो या दो से ज्यादा बच्चों के होने की वजह से डिवाइस की कमी होना लगभग हर घर की कहानी है। इसका असर यह होता है कि एक बच्चा ही लगातार क्लास कर पाता है। बाकी बच्चों के लिए क्लास करना बहुत मुश्किल हो जाता है। खाली होना अपने अंदर कई अवगुणों को लेकर आता है। बच्चे कई सारे गलत आदतों का शिकार हो रहे हैं।

 रोजी रोटी की जिम्मेदारी से कमजोर हो रही परवरिश

बेरोज़गारी की मार और लगातार तनख्वाह कम होने की वजह से परिवार का खर्च चलाने के लिए परिवार की एक से ज्यादा सदस्यों को काम करना पड़ रहा है। महंगाई की लगातार बढ़ोतरी से घर का खर्च चलाना मुश्किल होता जा रहा है। पिता के साथ साथ माँ को भी 12 - 12 घंटे काम पर रहना पड़ता है। 
घर में बच्चों का अकेला होना उन्हें आजादी देता है। पारिवारिक निगरानी की कमजोरी की वजह से किशोरों की संगत और रुचि में बदलाव देखने को मिल रहा है। मजबूरन ही सही पर बच्चों को समय न देने, निगरानी न रख पाने की वजह से अच्छे परवरिश की कमी दिख रही है। और यूथ अपने मकसद से भटक रहे हैं।

लेखक:
प्रदीप चौहान
अध्यापक, कवि व सिटीजन जर्नलिस्ट

बुधवार, 16 सितंबर 2020

बेरोज़गार हो गए अख़बार बाँटने वाले।: प्रदीप चौहान




कोरोना के डर, डिजिटल जुड़ाव और लोक़डाउन के बाद अख़बारों की कम होती माँग की वजह से हज़ारों अख़बार बाँटने वाले, बेरोज़गार हो गए हैं। 

सुबह की भोर में जब चकाचौंध दिल्ली, सबसे प्यारी नींद के आग़ोश में सो रही होती है। उसी भोर में कुछ किशोर साइकिल की हैंडल पर टोकरी और थैले लिए निकल जाते हैं अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाने। अख़बारों के थोक मूल्य पर मिलने वाले सेंटरों पर पहुँचकर, अलग अलग कम्पनियों के अख़बार ख़रीदते हैं। मुख्य पन्नो के बीच सप्लिमेंटरी पन्ने भरते हैं। और मालिक की निगरानी मे गिनकर अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी लेकर चल पड़ते हैं। 

साइकिल चलाते-चलाते किसी के दरवाज़े तो किसी की बहुमंज़िली बालकनियों में रबड़ से लपेटे अख़बार फेंकते हैं। गिनती के अख़बारों की ज़िम्मेदारी ऐसी की निशाना हमेशा सटीक ही लगता है। 


चाहे कड़ाके की ठंड हो या तेज़ बारिश, रविवार हो या कोई राष्ट्रीय अवकाश। दिवाली और होली के बासी दिन के अलावा, इनके लिए कोई छुट्टी नहीं होती। 

हर दिन दो से तीन घंटे के काम के बाद, ज़िम्मेदारी और अख़बारों की संख्या के आधार पर 800/- से लेकर 1500/- रुपये तनख़्वाह मिलती है। जिसके लिए ये मेहनती जोशिले नौजवान काम करते हैं।


ज़्यादातर झुग्गी बस्तियों में रहने वाले किशोरों के लिए अख़बार बाँटना मुख्य पार्ट टाइम काम है जिसे करके वो अपने ट्यूशन की फ़ीस देते हैं। अपना जेब ख़र्च चलाते हैं। और परिवार चलाने में आर्थिक मदद करते हैं। 


प्रधानमंत्री द्वारा लिए गए शुरुवाती 21 दिन के लॉकडाउन के फ़ैसले के मद्देनज़र नेहरू प्लेस जैसे कई अख़बार सेंटरों के वेंडर्स असोसीशन ने यह फ़ैसला लिया की लॉकडाउन में कोई भी अख़बार का काम नहीं करेगा। सरकार के  भारत बंद के फ़ैसले का सम्मान किया जाएगा। और ऐसा ही हुआ।


हालाँकि सरकारों ने अख़बार के काम कोजरुरी सेवाकी श्रेणी में रखा और -पास लेकर काम करने की इजाज़त दी। लेकिन हर मोड़, हर चौराहे पर हुए सरकारी नाकाबंदी और रेज़िडेंट वेलफ़ेयर असोसिएशन के द्वारा प्रवेश द्वार बंद कर दिए जाने की वजह से, अख़बार बाँटना मुश्किल हो गया। अनेकों हाउसिंग सोसाइटीस ने बाहरी लोगों का प्रवेश रोक दिया।


दूसरी तरफ़ अख़बार से कोरोना फैलने के पुख़्ता सबूत ना मिलने के डबल्यू॰एच॰ओ॰ के बयान के बावजूद भी, भारी संख्या में मासिक अनुबंध पर अख़बार लेने वालों ने, लेना बंद कर दिया। वेंडर्स ने अख़बारों की संख्या कम होने की वजह से अख़बार डालने वाले लड़कों को निकलना शुरू कर दिया। आज हालात ये है की इनमें से लगभग 80% अख़बार डालने वाले बेरोज़गार हो गए हैं।


नेहरु प्लेस के एक वेंडरचौहान नियूज सर्विसेजके अनुसार कोरोना के डर की वजह से लगभग 40% से ज़्यादा रीडर्स ने अख़बार लेना बंद कर दिया है। जिसकी वजह से काम कम हो गया है। इसका असर ये है की वेंडर्स को अपने यहाँ सालों से काम कर रहे लड़कों को मजबूरन निकलना पड़ा है। 


अख़बार बाँटने का काम करने वाले एक युवक ने बताया कीये काम परिवार की आर्थिक मदद और अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए करता था। लोकडाउन की वजह से पिता के पास काम नहीं है और मैं भी बेरोज़गार हो गया हुँ।


अखबार डिलीवरी का काम करने वाले लोगों की बेरोज़गारी किसी को नहीं दिखती है जरुरी सेवा की श्रेणी में होने के बावजूद भी न तो राज्य सरकार और न ही केंद्र की तरफ से किसी तरह का राहत दिया गया। बेरोज़गारों का ये तबका किसी भी गिनती में नहीं आता किसी को इनकी कोई परवाह नहीं 

पुरे दिल्ली में एक सौ से ज़्यादा सेंटर्स हैं जहाँ लगभग सभी अख़बार थोक क़ीमत पर मिलते हैं। हर सेंटर पर लगभग 100 से ज़्यादा वेंडर्स आते थे। हर वेंडर के पास दो से तीन अख़बार बाँटने वाले काम करते थे। और लगभग सभी वेंडर्स ने अपने यहाँ काम करने वालों को मजबूरन हटाया है। हज़ारों की संख्या में अख़बार डालने वाले बेरोज़गार हो गए हैं। 

गुरुवार, 18 जुलाई 2019

झुग्गी-बस्तियों में शिक्षा के विकास में दीपालय ने पुरे किये अपने 40 साल


Deepalaya Founders' Day

16 जुलाई, 40 साल के युवा बने दीपालय परिवार के लिए एक बड़ा दिन था। इस ख़ास अवसर को परिवार ने  बहुत उत्साह और उल्लास से मनाया। वायु सेना के सभागार, सुब्रतो पार्क, धौला क़ुंआ में सामाजिक बदलाव में मील का पत्थर साबित हुए दीपालय की 40 साल की यात्रा को धूमधाम से मनाया गया। हजारों की संख्या में स्टाफ, विद्यार्थी, स्पोंसर्स, डोनर्स, बोर्ड मेंबर्स और दीपालय समर्थक मौजूद रहे। 

समारोह की अध्यक्षता जाने-माने नाटककार प्रो. श्री ओमचेरी एन एन पिल्लई ने किया। मुख्य अतिथि केंद्रीय मंत्री श्री वी मुरलीधरन थे। सेवानिर्वित आई ए एस श्रीमती रेवा नय्यर, व अन्य सम्मानित अतिथि मौजूद रहे।  कई न्यूज़ चैनल्स और अख़बारों के संवाददाता भी अपनी टीम के साथ कार्यक्रम के कवरेज के लिए मौजूद रहे।

कार्यक्रम की शुरुवात मिस एलिज़ाबेथ फिलिप के शास्त्र वाचन और मिस जिन्सी और मिस शालिनी के स्वागत सन्देश से किया गया। मुख्य अतिथियों के आगमन पर दीप प्रज्वलित करने के उपरांत श्री ए जे फिलिप (सेक्रेटरी एंड चीफ एग्जीक्यूटिव) के  स्वागत भाषण, प्रोफेसर ओमचेरी एन एन पिलइ के भाषण और मुख्य अतिथि के व्याख्यान के द्वारा दीपालय के पिछले 40 वर्षों की यात्रा, चुनौतियों और उपलब्धियों को विस्तारपूर्वक बताया गया। 

जिसमे ये बात निकल कर आई कि दिल्ली में काम कर रहे सात केरलवासी 1979 में 2500 रुपये के निवेश के साथ दीपालय शुरू करने के लिए आए थे। दीपालय की शुरुआत पांच छात्रों और एक शिक्षक के साथ की गई थी। पिछले चालीस वर्षों में, लगभग 3.5 लाख छात्रों ने दीपालय के स्कूलों में अध्ययन किया है। उन छात्रों का भारी बहुमत समाज के सबसे आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों से था। उनमें से ज्यादातर झुग्गियों या झुग्गी-बस्तियों में रहते थे। यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि अगर दीपालय नहीं होता, तो उनमें से कई स्कूल के अंदर नहीं दिखते। आज, वे सभी जीवन में अच्छा कर रहे हैं, उनमें से कुछ ही दीपालय में उच्च पदों पर आसीन हैं।

सांस्कृतिक कार्यक्रमों में एक तरफ गायन के क्षेत्र में प्रतिभावान विद्यार्थी और अध्यापकों ने सरस्वती वंदना गाकर सभा में मौजूद हजारों दर्शकों को मन मोह लिया तो दूसरी तरफ दीपालय परिवार के शिक्षक गायक हिमांशु तथा पूर्व विद्यार्थी व गायक विशाल गुप्ता और सुमित डोगरा ने अपनी गायकी से सबको झूमने पर मजबूर कर दिया।  इसी बिच सोवेनियर नामक किताब का वोमोचन किया गया। 

सामाजिक बदलाव को ध्यान में रखते हुए मलाला थीम के ऊपर स्किट और डांस, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ थीम पर आधारित नृत्य और जुर्म की और बढ़ते युवा नामक नाटक प्रस्तुति ने समाज को सन्देश दिया और सबका मन मोह कर जोरदार तालिया बटोरी।

सभा में मौजूद दर्शकों के लिए एक तरफ मुख्य आकर्षक रहे दीपालय स्पेशल यूनिट के शारीरिक चुनौतियों वाले स्पेशल बच्चे जिन्होंने समावेशी शिक्षा पर आधारित डांस प्रश्तुत किया। वही दूसरी तरफ वोकेशनल ट्रेनिंग के विद्यार्थियों के द्वारा प्रस्तुत फ्यूजन डांस की उम्दा कलाबाजियों ने दर्शकों को दांतो तले उंगलिया चबाने पर मजबूर कर दिया। 

समाज में शैक्षिक बेहतरी के खास मकसद के लिए वित्तीय दानकर्ताओं के सम्मान के बाद श्री टी के मैथ्यू (फॉउन्डिंग मेंबर और पूर्व सेक्रेटरी एंड चीफ एग्जीक्यूटिव) की बायोग्राफी का विमोचन किया गया।  और अंततः मुख्य क्रियाशील एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर मिस जसवंत कौर के वोट ऑफ़ थैंक्स के बाद इस भव्य उत्सव का समापन किया गया। 

शुक्रवार, 1 मार्च 2019

युवाओं के लिए प्रेरणादायक कार्यशाला का आयोजन


युवाओं के लिए प्रेरणादायक कार्यशाला सत्र  "व्हाट्स नेक्स्ट?" का आयोजन

वीटीसी दीपालाय ने 28 फरवरी 2019 को संजय कॉलोनी में एक कैरियर परामर्श सह प्रेरक कार्यशाला सत्र का आयोजन किया। कार्यशाला का विषय था "व्हाट्स नेक्स्ट"।
 वीसोक एडवाइजर्स के संस्थापक और सी इ ओ, श्री रवि शर्मा ने यह दिलचस्प सत्र लिया, जिसमें 36 युवाओं ने भाग लिया जिसमें वीटीसी के वर्तमान व पूर्व छात्रों के आलावा युवा क्लब के सदस्य शामिल थे।
कार्यशाला की शुरुआत में श्री रवि शर्मा ने प्रतिभागियों से पूछा कि वे क्या बनना चाहते हैं। प्रतिभागियों ने अपने सपनों को व्यक्त किया जैसे कि एक रक्षा कार्मिक, वेब डिजाइनर, नर्स, एथिकल हैकर, शिक्षक, फैशन डिजाइनर आदि। कुछ ऐसे प्रतिभागी भी थे जिन्होंने जवाब दिया कि उन्होंने अभी तक निर्णय नहीं लिया है।

अगली बात जो चर्चा में थी की ऐसे व्यवसाय का चयन करें जिसमे उनकी दिलचस्पी हो और जिसके लिए उन्हें बनाया गया है । उसके बाद श्री रवि शर्मा ने जीवन में कोई भी निर्णय लेने से पहले "क्यों" पूछने का महत्व बताया। उन्होंने छात्रों से पूछा कि वे अपने जीवन में क्या चाहते हैं। उत्तर था समृद्धि और शांति। फिर उन्होंने समझाया कि अब हम पूरी तरह से हम पर निर्भर हैं और हमारा भविष्य भी हमारे हाथों में रहेगा। यह दूसरों या स्थितियों को दोष देने से कोई फायदा नहीं है।
जीवन में समृद्धि के लिए हमें अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करना होगा और उन चीजों से बचना होगा जो हमें इसे हासिल करने से विचलित करेंगी। ऐसे केंद्रित जीवन का नेतृत्व करने से हमें अपने सपनों को साकार करने और समृद्धि लाने में मदद मिलेगी। लेकिन अकेले समृद्धि हमारे जीवन में शांति नहीं ला सकती है।

जीवन में शांति, किसी से कुछ हमेशा पाने पर निर्भर नहीं करती है। बल्कि जब आप दूसरों को कुछ देना शुरू करते हैं  तभी आपको असल में मानसिक शांति मिलती है। यद्धपि हमारा परिवार हमारा केंद्र हो सकता है, धन के साथ मदद करने के रूप में हमारी मदद करता है, बुजुर्ग लोगों की तरह दूसरों के साथ समय बिताना या शारीरिक मदद की पेशकश केवल हमारे परिवार तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए बल्कि यह समाज में अन्यों के साथ करना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि स्वार्थी कार्य क्या हैं और निःस्वार्थ कार्य क्या हैं।

उन्होंने युवाओं से वर्तमान में जीने के लिए भी कहा। छोटे बच्चों के मन की शांति होती है क्योंकि वे अतीत या भविष्य के बारे में ज्यादा चिंतित नहीं होते हैं। वे हमेशा वर्तमान में रहते हैं। सफल होने के लिए हमें अतीत और भविष्य की चिंता करने के बजाय अपने वर्तमान पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अपने मन का अभ्यास करने की आवश्यकता है।

सत्र समाप्त करने से पहले प्रतिभागियों को प्रश्न पूछने का अवसर दिया गया जिसमें उन्होंने सामान्य और व्यक्तिगत प्रश्न पूछे जिनका उत्तर श्री रवि शर्मा ने अपनी पूर्ण संतुष्टि के लिए दिया।

परियोजना समन्वयक श्री जेम्सकुट्टी वी.ई. और दीपालय वीटीसी के कंप्यूटर प्रशिक्षक श्री प्रदीप कुमार भी इस उपयोगी कार्यशाला में शामिल हुए।

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

दीपालय व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र ने चलाया कंप्यूटर साक्षरता जागरूकता अभियान



दीपालय व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र ने चलाया कंप्यूटर साक्षरता जागरूकता अभियान

दीपालय व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र के संजय कॉलोनी शाखा ने संजय कॉलोनी व आसपास के कॉलोनियों में लोगों को कंप्यूटर साक्षरता का महत्व व उपयोगिता समझाने का अभियान चलाया। जिसमे घर घर जाकर महिलाओं और नौजवानों से बातचीत और चर्चा करके विस्तार से समझाया गया और साथ ही साथ एडमिशन लेने के लिए प्रेरित किया गया।
मोबलाइजेशन टीम में शामिल कंप्यूटर इंस्ट्रक्टर प्रदीप कुमार, मोब्लाइज़र मिस रीमा और लाइब्रेरियन मिस पुष्पा ने संश्था द्वारा चलाये जा रहे व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र, उसके अलग अलग पाठ्यक्रमों, सामुदायिक लाइब्रेरी व अन्य सुविधावों के बारे में बताया।

इंस्ट्रक्टर प्रदीप ने बताया की दीपालय कंप्यूटर सेंटर संजय कॉलोनी, शंस्था द्वारा दिल्ली के विभिन्न इलाकों में चलाये जा रहे व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों में से एक है, जहाँ कंप्यूटर कोर्स फॉर आईटी एंड बिगनर्स, कंप्यूटर कोर्स फॉर एडवांस वर्ड एंड एक्सेल, कंप्यूटर कोर्स फॉर डिजिटल लिटरेसी, डाटा एंट्री, ग्राफ़िक डिजाइनिंग और वेब डिज़ाइनिंग जैसे कोर्सेज कराये जाते हैं।

प्रोजेक्ट को-ऑर्डिनेटर जेम्स कुट्टी ने बताया की दिल्ली में दीपालय द्वारा संचालित चार व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र, एन.आई.आई.टी फाउंडेशन के सहयोग से विभिन्न कंप्यूटर पाठ्यक्रमों को चला रहे है। जिसके जरिये समाज के वंचित युवाओं को कंप्यूटर प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। केंद्रों का उद्देश्य छात्रों के बीच उद्यमशीलता और व्यक्तित्व गुणों को विकसित करना है, साथ ही उन्हें कॉर्पोरेट् और अन्य क्षेत्रों में नौकरियों के लिए तैयार करना है।

दीपालाय के बारे में
दीपालाय एक आईएसओ 9001:2008 प्रमाणित गैर-सरकारी संगठन है जो आत्मनिर्भरता को सक्षम करने में विश्वास करता है और महिलाओं और बच्चों पर विशेष ध्यान देने के साथ शहरी और ग्रामीण गरीबों को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर काम करने के लिए प्रतिबद्ध है।
यह गैर-सरकारी संगठन 16 जुलाई, 1979 को सात संस्थापक सदस्यों द्वारा शुरू किया गया था और तीन से अधिक दशकों से निरक्षरता के विरूद्ध धर्मयुद्ध में योगदान दे रहा है। वर्षों से दीपालय ने शिक्षा (औपचारिक/गैर-औपचारिक/उपचारात्मक), महिला सशक्तिकरण (प्रजनन स्वास्थ्य, एसएचजी, माइक्रो-फाइनेंस), संस्थागत देखभाल, सामुदायिक स्वास्थ्य, व्यावसायिक प्रशिक्षण आदि के क्षेत्रों में कई परियोजनाएं चलायी हैं। हमारी परियोजनाएं दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, और तेलांगना में चल रही हैं।

शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

सफदरजंग अस्पताल में नाकाफ़ी व्यवस्था: ठिठुरती ठंड में सड़क पर सोने को मजबूर परिजन

सफदरजंग अस्पताल में नाकाफ़ी व्यवस्था: ठिठुरती ठंड में सड़क पर सोने को मजबूर परिजन देश के बड़े अस्पतालों में शुमार दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल, जहाँ दिल्ली व आसपास के राज्यों के दूरदराज़ इलाक़ों से मरीज़ अपने परिजनों के साथ इलाज कराने आते हैं लेकिन यहाँ ठहरने का उचित प्रबंध न होने की वजह से सैकड़ों लोग हड्डियों को कंपकंपाती ठंड में भी सड़क, फुटपाथ व गलियों में सोने को मजबूर हैं। औरतों, बच्चों व बुज़ुर्गों का इमेरजेंसी व विभिन्न वार्डों के बाहर एक चटाई पर लेटे और एक कम्बल ओढ़े ठंड से कांपते परिजनों की ठिठुरती आँखें, अंदर भर्ती किसी अपने के बेहतरी को तकती हैं और सरकार के तमाम झूठे दावों की पोल खोलतीं हैं। जिसमे कहा जाता है की दिल्ली के अस्पताल सम्पूर्ण सुविधा संपन हैं। ओखला से आयी किरण जिनके परिवार का एक सदस्य डिलिवरी वार्ड में भर्ती है, ने बताया की अंदर का इंतज़ाम भी नाकाफ़ी है। वार्ड में बेड ख़ाली नहीं हैं जिसकी वजह से एक बेड पर दो या दो से ज़्यादा मरीज़ इलाज करवाने को मजबूर हैं। इसके अलावा उन्होंने बताया की हर मरीज़ के साथ इजाजतन रुके एक परिजन के बैठने व सोने का कोई उचित प्रबंध भी नहीं है। परिजनों को बेड के नीचे बैठना पड़ता है। जहाँ कोकरेच भी घुमते रहते हैं। और इसी वजह से परिवार के कई सदस्य बरी बारी से मरीज़ के पास रहते हैं। उन्होंने बताया की परिजनों के बिस्तर, ओढ़ने व ठहरने का कोई प्रबंध अस्पताल की तरफ़ से नहीं किया हुआ है। हमें अपना प्रबंध ख़ुद करना पड़ता हैं। और कहीं जगह नहीं मिलने पर खुले फुटपाथ पर सोना पड़ता हैं।

नशे की दलदल में डूबता बचपन : प्रदीप चौहान

दिल्ली की स्लम बस्तियों में दस-दस साल के बच्चे, छोटी उम्र में गांजा, शराब व अन्य बुरी आदतों के शिकार हो रहे हैं। जिस उम्र में ज्यादातर बच्चे...