बुधवार, 20 अक्टूबर 2021

स्लम युवाओं का अंधकारमय भविष्य: प्रदीप चौहान

एक के बाद दूसरी कोरोना की लगातार दो लहरों का बुरा प्रभाव झुग्गी बस्तियों में देखने को मिलता है। ज्यादातर लोगों की नौकरियां चली गई हैं। छोटे-मोटे रोजगार करने वालों के रोजगार ठप पड़ गए हैं। असंगठित मज़दूरों की श्रेणी में आने वाली ज्यादातर आबादी झुग्गी बस्ती में बस्ती है। 
 स्लम युवावों के द्वारा अपने जीवन और करियर को लेकर बनायी गई भविष्य की योजनाएं फेल हो रही हैं। आगे का रास्ता साफ नजर नहीं आता। काम की कमी से परेशान, खाली, बेकार पड़ा नौजवान कई गलत आदतों व नशे का शिकार हो रहा है। 

 नशे के व्यापार का बढ़ना बड़ी समस्या।

स्लम कालोनियों में खुलेआम शराब बेची जाती है। गली गली कच्ची शराब की दुकानें मौजूद हैं। राजनीति, पुलिस और नौकरशाहों की मजबूत सांठ गांठ से नशे का व्यापार फल फूल रहा है। गलियों में गांजा मिलना या बिकना आम बात है। 
एक या दो बार से ज्यादा गांजे का सेवन करने के बाद युथ इस नशे का आदी हो जाता है। पार्कों, सुनसान जगहों पर युवावों के समूह का गांजा पीते हुए दिखना आम नाज़ारा है। 
नशीले पदार्थों का आसानी से उपलब्ध होने की वजह से छोटे छोटे बच्चे भी इसकी तरफ आकर्षित हो रहे हैं। स्लम बस्तियों में बसने वाली भावी पीढ़ी नशे से बर्बाद हो रही है।
 जुआ और सट्टे के बढ़ते साम्राज्य का शिकार हो रहा युवा।

स्लम कालोनियों में नौजवानों का एक बड़ा हुजूम गलियों,  नुक्कड़ों और खाली रास्तों पर इकट्ठा होता है और विभिन्न ऑनलाइन सट्टा एप पर पैसा लगाता है। 
आजकल यह बहुत आम बात है। 10 साल के बच्चे भी इसमें निपुण हैं। एक के बाद एक युवाओं का कई ग्रुप तैयार हो जाते हैं। एक बार पैसा लगाने के बाद वह बार-बार सट्टा लगाते हैं।
 
जिसका नम्बर आ गया वो पार्टी देता है। खुलेआम शराब पी और पिलाई जाती है। देर रात तक इन्हीं ग्रुप में गाली गलौज करने,  आपस में झगड़ते और मारपीट की खबरें आम बात हो गई है। 
इसके अलावा युवाओं के इस नशे का फ़ायदा उठाते हुए कुछ लोकल दबंग या यूं कहें कि ऊपर तक पहुंच रखने वाले लोग, अलग-अलग माध्यमों से सट्टे का एक साम्राज्य चलाते हैं। जिसका शिकार आज की युवा पीढ़ी हो रही है।

 ऑनलाइन गेम से समय की हो रही बर्बादी।

स्कूल जाने वाले छोटे बच्चे हों या कॉलेज जाने वाले नौजवान, सबके लिए मोबाइल ऑनलाइन पढ़ाई के लिए पहली जरूरत बनकर उभरा है। अभिभावकों की निगरानी ना होने की वजह से बच्चों को सोशल मीडिया और गेम्स की तरफ जाने का मौका मिल जाता है। 
चाहे पब्जी हो, फौजी या बात करें हम फ्री फायर की। गलियों में या खाली जगहों पर इकट्ठा होकर दो या दो से ज्यादा नौजवान आपस में प्लेयर्स लेते हैं और गेम खेलते हैं।इसका नशा इस कदर है कि वह पूरे पूरे दिन उसी गेम्स में लगे रहते हैं जबतक कि उनका इंटरनेट डेटा खत्म ना हो जाए। 

गेम्स खेलना एक नशे की तरह उभरा है और युवाओं का कीमती समय जो उनकी पढ़ाई में, फिजिकल एक्टिविटी में या उनके डेवलपमेंट में लगना चाहिए था वह समय यूं ही गेम्स खेल कर बर्बाद हो रहा है।

 शिक्षा संस्थानों के बंद होने का पड़ रहा बुरा प्रभाव।

बच्चों और नौजवानों का ज्यादातर समय कॉलोनियों से बाहर शिक्षा संस्थानों में बीतता था। कोरोना महामारी की लगातार दो लहरों और लॉकडाउन की वजह से ज्यादातर शिक्षा संस्थान बंद हैं। बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई तो चल रही है लेकिन डिवाइसेज और दूसरे रिसोर्सेज की कमी है। 

एक घर में दो या दो से ज्यादा बच्चों के होने की वजह से डिवाइस की कमी होना लगभग हर घर की कहानी है। इसका असर यह होता है कि एक बच्चा ही लगातार क्लास कर पाता है। बाकी बच्चों के लिए क्लास करना बहुत मुश्किल हो जाता है। खाली होना अपने अंदर कई अवगुणों को लेकर आता है। बच्चे कई सारे गलत आदतों का शिकार हो रहे हैं।

 रोजी रोटी की जिम्मेदारी से कमजोर हो रही परवरिश

बेरोज़गारी की मार और लगातार तनख्वाह कम होने की वजह से परिवार का खर्च चलाने के लिए परिवार की एक से ज्यादा सदस्यों को काम करना पड़ रहा है। महंगाई की लगातार बढ़ोतरी से घर का खर्च चलाना मुश्किल होता जा रहा है। पिता के साथ साथ माँ को भी 12 - 12 घंटे काम पर रहना पड़ता है। 
घर में बच्चों का अकेला होना उन्हें आजादी देता है। पारिवारिक निगरानी की कमजोरी की वजह से किशोरों की संगत और रुचि में बदलाव देखने को मिल रहा है। मजबूरन ही सही पर बच्चों को समय न देने, निगरानी न रख पाने की वजह से अच्छे परवरिश की कमी दिख रही है। और यूथ अपने मकसद से भटक रहे हैं।

लेखक:
प्रदीप चौहान
अध्यापक, कवि व सिटीजन जर्नलिस्ट

नशे की दलदल में डूबता बचपन : प्रदीप चौहान

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