रविवार, 26 दिसंबर 2021

स्लम, कतरन और रोज़गार : प्रदीप चौहान

ओखला इंडस्ट्रियल एरिया फेस 2 के बीचो बीच बसे छोटे बड़े स्लम बस्तियों में एक बड़ी आबादी बसती है। ऐसी झुग्गी बस्तियाँ जहां एक्सपोर्ट से निकले हुए कपड़े का कचरा लाया जाता है और उस की वैरायटी और क्वालिटी के आधार पर अलग अलग किया जाता है। अप-साइकलिंग से विभिन्न चिझें तैयार की जाती हैं। रीसाइक्लिंग के लिए आगे भेजा जाता है। इस पूरे प्रोसेस में कतरन की लोडिंग, अनलोडिंग, छटाई, उसकी पैकिंग, सिलाई, बिक्री आदि के प्रोसेस में कुछ लोग जिन्हें कबाड़ी कहा जाता है, स्वरोजगार करते हैं और अपने साथ साथ सैकड़ों लोगों को रोजगार देते हैं जिनमें मुख्यतः अशिक्षित ग़रीब महिलाएं शामिल हैं।

 कपड़े के कचरे के निपटारे से व्यापार

दिल्ली एनसीआर और आसपास के इंडस्ट्री एरिया की एक्सपोर्ट हाउसेस में कपड़े का जो कचरा बच जाता है उस कचरे को संजय कॉलोनी व अन्य कॉलोनियों के कबाड़ी, वजन के हिसाब से उन्हें खरीद लेते हैं। उसके बाद कपड़े की क्वालिटी या कपड़े की किस्म के आधार पर अलग अलग किया जाता है।  
छंटाई करने के बाद अलग-अलग बोरियों में पैक किया जाता है। और इसको बड़े इंडस्ट्रीज जहां पर रीसाइक्लिंग होता है वहां पर बेचा जाता है। एक पर्टिकुलर मार्जिन से ये सारा बिजनेस चलता है। यह प्रोसेस एक तरफ कपड़ों के कचरा का रिसाइकल करने में मदद कर रहा है वहीं दूसरी तरफ कचरे से लोगों के लिए रोजगार पैदा कर रहा है।

 महिलाओं के लिए रोज़गार

आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की महिलाएं जिनकी शिक्षा बहुत कम होती है या उम्र ज्यादा होती है उनके लिए रोजगार का एक बहुत बड़ा साधन है। जिन महिलाओं को उनके शिक्षा की वजह से या उम्र की वजह से या स्किल की वजह से आसपास की कंपनियों में काम नहीं मिल पाता उन महिलाओं के लिए कतरन की छटाई करना एक सहायक रोजगार के रूप में उभरा है। 
इससे महिलाएं अपने परिवार को आर्थिक सपोर्ट कर पाती हैं। बच्चों की परवरिश को उनकी शिक्षा में मदद कर पाती हैं। संजय कॉलोनी और आसपास की कॉलोनियों के लिए रीसाइक्लिंग का यह काम एक बड़े विकल्प के रूप में उभर कर सामने आया है जिससे महिलाओं को बिना किसी क्वालिफिकेशन व सर्टिफिकेट की आवश्यकता के उन्हें काम देता है।
छंटाई का काम करने वाली महिलाओं को दिहाड़ी के रूप में 300 से लेकर ₹400 तक मिलता है। जितने दिन काम करती हैं इतने दिन का पैसा मिलता है। इसमें बहुत ज्यादा बंधन नहीं होता जिसके पास भी माल यानी कतरन आता है उसके पास कर लेती हैं। रोज़ाना या हफ्ते में उनको उनका मेहनताना मिल जाता है।

 पुनर्प्रयोग से स्वरोजगार (livelihood by Upcycling)

कपड़ों के कतरन के टुकड़ों में बड़े बड़े पीस भी होते हैं। बड़े साइज के टुकड़ों को अलग किया जाता है। संजय कॉलोनी और आसपास की कॉलोनियों में घर घर मशीनें बिठाकर लोग कतरन से स्कर्ट, टीशर्ट या अन्य रेडीमेड कपड़े तैयार करते हैं। कई लोग कपड़े की कतरन से दरिया, डोर मैट, बाथ मैट, फ्रीज़ कवर, कपड़े के थैले इत्यादि तैयार करते हैं। 

तैयार माल को थोक में सीलमपुर, गांधी नगर या अन्य जगहों से आए व्यापारियों को थोक रेट में बेच दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में अप-साइकिलिंग से स्वरोजगार को बढ़ावा मिल रहा है और साथ ही साथ रोजगार सृजन से कई परिवारों का पालन पोषण चल रहा है।

 रिसाइक्लिंग में योगदान

कपड़ों के अलग-अलग टुकड़ों को उनकी क्वालिटी और उनकी किस्म के आधार पर उन्हें अलग अलग किया जाता है। और अलग-अलग बोरियों में पैक करके बड़ी-बड़ी रीसाइक्लिंग कंपनियों को बेचा जाता है। वो कंपनियां इनसे धागा बनाती हैं और धागे से दुबारा कपड़ा बनता है। इस तरह से कतरन के रीसाइक्लिंग के प्रोसेस में स्लम कॉलोनियों के लोग बहुत बड़ा योगदान देते हैं।

बुधवार, 20 अक्टूबर 2021

स्लम युवाओं का अंधकारमय भविष्य: प्रदीप चौहान

एक के बाद दूसरी कोरोना की लगातार दो लहरों का बुरा प्रभाव झुग्गी बस्तियों में देखने को मिलता है। ज्यादातर लोगों की नौकरियां चली गई हैं। छोटे-मोटे रोजगार करने वालों के रोजगार ठप पड़ गए हैं। असंगठित मज़दूरों की श्रेणी में आने वाली ज्यादातर आबादी झुग्गी बस्ती में बस्ती है। 
 स्लम युवावों के द्वारा अपने जीवन और करियर को लेकर बनायी गई भविष्य की योजनाएं फेल हो रही हैं। आगे का रास्ता साफ नजर नहीं आता। काम की कमी से परेशान, खाली, बेकार पड़ा नौजवान कई गलत आदतों व नशे का शिकार हो रहा है। 

 नशे के व्यापार का बढ़ना बड़ी समस्या।

स्लम कालोनियों में खुलेआम शराब बेची जाती है। गली गली कच्ची शराब की दुकानें मौजूद हैं। राजनीति, पुलिस और नौकरशाहों की मजबूत सांठ गांठ से नशे का व्यापार फल फूल रहा है। गलियों में गांजा मिलना या बिकना आम बात है। 
एक या दो बार से ज्यादा गांजे का सेवन करने के बाद युथ इस नशे का आदी हो जाता है। पार्कों, सुनसान जगहों पर युवावों के समूह का गांजा पीते हुए दिखना आम नाज़ारा है। 
नशीले पदार्थों का आसानी से उपलब्ध होने की वजह से छोटे छोटे बच्चे भी इसकी तरफ आकर्षित हो रहे हैं। स्लम बस्तियों में बसने वाली भावी पीढ़ी नशे से बर्बाद हो रही है।
 जुआ और सट्टे के बढ़ते साम्राज्य का शिकार हो रहा युवा।

स्लम कालोनियों में नौजवानों का एक बड़ा हुजूम गलियों,  नुक्कड़ों और खाली रास्तों पर इकट्ठा होता है और विभिन्न ऑनलाइन सट्टा एप पर पैसा लगाता है। 
आजकल यह बहुत आम बात है। 10 साल के बच्चे भी इसमें निपुण हैं। एक के बाद एक युवाओं का कई ग्रुप तैयार हो जाते हैं। एक बार पैसा लगाने के बाद वह बार-बार सट्टा लगाते हैं।
 
जिसका नम्बर आ गया वो पार्टी देता है। खुलेआम शराब पी और पिलाई जाती है। देर रात तक इन्हीं ग्रुप में गाली गलौज करने,  आपस में झगड़ते और मारपीट की खबरें आम बात हो गई है। 
इसके अलावा युवाओं के इस नशे का फ़ायदा उठाते हुए कुछ लोकल दबंग या यूं कहें कि ऊपर तक पहुंच रखने वाले लोग, अलग-अलग माध्यमों से सट्टे का एक साम्राज्य चलाते हैं। जिसका शिकार आज की युवा पीढ़ी हो रही है।

 ऑनलाइन गेम से समय की हो रही बर्बादी।

स्कूल जाने वाले छोटे बच्चे हों या कॉलेज जाने वाले नौजवान, सबके लिए मोबाइल ऑनलाइन पढ़ाई के लिए पहली जरूरत बनकर उभरा है। अभिभावकों की निगरानी ना होने की वजह से बच्चों को सोशल मीडिया और गेम्स की तरफ जाने का मौका मिल जाता है। 
चाहे पब्जी हो, फौजी या बात करें हम फ्री फायर की। गलियों में या खाली जगहों पर इकट्ठा होकर दो या दो से ज्यादा नौजवान आपस में प्लेयर्स लेते हैं और गेम खेलते हैं।इसका नशा इस कदर है कि वह पूरे पूरे दिन उसी गेम्स में लगे रहते हैं जबतक कि उनका इंटरनेट डेटा खत्म ना हो जाए। 

गेम्स खेलना एक नशे की तरह उभरा है और युवाओं का कीमती समय जो उनकी पढ़ाई में, फिजिकल एक्टिविटी में या उनके डेवलपमेंट में लगना चाहिए था वह समय यूं ही गेम्स खेल कर बर्बाद हो रहा है।

 शिक्षा संस्थानों के बंद होने का पड़ रहा बुरा प्रभाव।

बच्चों और नौजवानों का ज्यादातर समय कॉलोनियों से बाहर शिक्षा संस्थानों में बीतता था। कोरोना महामारी की लगातार दो लहरों और लॉकडाउन की वजह से ज्यादातर शिक्षा संस्थान बंद हैं। बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई तो चल रही है लेकिन डिवाइसेज और दूसरे रिसोर्सेज की कमी है। 

एक घर में दो या दो से ज्यादा बच्चों के होने की वजह से डिवाइस की कमी होना लगभग हर घर की कहानी है। इसका असर यह होता है कि एक बच्चा ही लगातार क्लास कर पाता है। बाकी बच्चों के लिए क्लास करना बहुत मुश्किल हो जाता है। खाली होना अपने अंदर कई अवगुणों को लेकर आता है। बच्चे कई सारे गलत आदतों का शिकार हो रहे हैं।

 रोजी रोटी की जिम्मेदारी से कमजोर हो रही परवरिश

बेरोज़गारी की मार और लगातार तनख्वाह कम होने की वजह से परिवार का खर्च चलाने के लिए परिवार की एक से ज्यादा सदस्यों को काम करना पड़ रहा है। महंगाई की लगातार बढ़ोतरी से घर का खर्च चलाना मुश्किल होता जा रहा है। पिता के साथ साथ माँ को भी 12 - 12 घंटे काम पर रहना पड़ता है। 
घर में बच्चों का अकेला होना उन्हें आजादी देता है। पारिवारिक निगरानी की कमजोरी की वजह से किशोरों की संगत और रुचि में बदलाव देखने को मिल रहा है। मजबूरन ही सही पर बच्चों को समय न देने, निगरानी न रख पाने की वजह से अच्छे परवरिश की कमी दिख रही है। और यूथ अपने मकसद से भटक रहे हैं।

लेखक:
प्रदीप चौहान
अध्यापक, कवि व सिटीजन जर्नलिस्ट

नशे की दलदल में डूबता बचपन : प्रदीप चौहान

दिल्ली की स्लम बस्तियों में दस-दस साल के बच्चे, छोटी उम्र में गांजा, शराब व अन्य बुरी आदतों के शिकार हो रहे हैं। जिस उम्र में ज्यादातर बच्चे...