ओखला इंडस्ट्रियल एरिया फेस 2 के बीचो बीच बसे छोटे बड़े स्लम बस्तियों में एक बड़ी आबादी बसती है। ऐसी झुग्गी बस्तियाँ जहां एक्सपोर्ट से निकले हुए कपड़े का कचरा लाया जाता है और उस की वैरायटी और क्वालिटी के आधार पर अलग अलग किया जाता है। अप-साइकलिंग से विभिन्न चिझें तैयार की जाती हैं। रीसाइक्लिंग के लिए आगे भेजा जाता है। इस पूरे प्रोसेस में कतरन की लोडिंग, अनलोडिंग, छटाई, उसकी पैकिंग, सिलाई, बिक्री आदि के प्रोसेस में कुछ लोग जिन्हें कबाड़ी कहा जाता है, स्वरोजगार करते हैं और अपने साथ साथ सैकड़ों लोगों को रोजगार देते हैं जिनमें मुख्यतः अशिक्षित ग़रीब महिलाएं शामिल हैं।
कपड़े के कचरे के निपटारे से व्यापार
दिल्ली एनसीआर और आसपास के इंडस्ट्री एरिया की एक्सपोर्ट हाउसेस में कपड़े का जो कचरा बच जाता है उस कचरे को संजय कॉलोनी व अन्य कॉलोनियों के कबाड़ी, वजन के हिसाब से उन्हें खरीद लेते हैं। उसके बाद कपड़े की क्वालिटी या कपड़े की किस्म के आधार पर अलग अलग किया जाता है।
छंटाई करने के बाद अलग-अलग बोरियों में पैक किया जाता है। और इसको बड़े इंडस्ट्रीज जहां पर रीसाइक्लिंग होता है वहां पर बेचा जाता है। एक पर्टिकुलर मार्जिन से ये सारा बिजनेस चलता है। यह प्रोसेस एक तरफ कपड़ों के कचरा का रिसाइकल करने में मदद कर रहा है वहीं दूसरी तरफ कचरे से लोगों के लिए रोजगार पैदा कर रहा है।
महिलाओं के लिए रोज़गार
आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की महिलाएं जिनकी शिक्षा बहुत कम होती है या उम्र ज्यादा होती है उनके लिए रोजगार का एक बहुत बड़ा साधन है। जिन महिलाओं को उनके शिक्षा की वजह से या उम्र की वजह से या स्किल की वजह से आसपास की कंपनियों में काम नहीं मिल पाता उन महिलाओं के लिए कतरन की छटाई करना एक सहायक रोजगार के रूप में उभरा है।
इससे महिलाएं अपने परिवार को आर्थिक सपोर्ट कर पाती हैं। बच्चों की परवरिश को उनकी शिक्षा में मदद कर पाती हैं। संजय कॉलोनी और आसपास की कॉलोनियों के लिए रीसाइक्लिंग का यह काम एक बड़े विकल्प के रूप में उभर कर सामने आया है जिससे महिलाओं को बिना किसी क्वालिफिकेशन व सर्टिफिकेट की आवश्यकता के उन्हें काम देता है।
छंटाई का काम करने वाली महिलाओं को दिहाड़ी के रूप में 300 से लेकर ₹400 तक मिलता है। जितने दिन काम करती हैं इतने दिन का पैसा मिलता है। इसमें बहुत ज्यादा बंधन नहीं होता जिसके पास भी माल यानी कतरन आता है उसके पास कर लेती हैं। रोज़ाना या हफ्ते में उनको उनका मेहनताना मिल जाता है।
पुनर्प्रयोग से स्वरोजगार (livelihood by Upcycling)
कपड़ों के कतरन के टुकड़ों में बड़े बड़े पीस भी होते हैं। बड़े साइज के टुकड़ों को अलग किया जाता है। संजय कॉलोनी और आसपास की कॉलोनियों में घर घर मशीनें बिठाकर लोग कतरन से स्कर्ट, टीशर्ट या अन्य रेडीमेड कपड़े तैयार करते हैं। कई लोग कपड़े की कतरन से दरिया, डोर मैट, बाथ मैट, फ्रीज़ कवर, कपड़े के थैले इत्यादि तैयार करते हैं।
तैयार माल को थोक में सीलमपुर, गांधी नगर या अन्य जगहों से आए व्यापारियों को थोक रेट में बेच दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में अप-साइकिलिंग से स्वरोजगार को बढ़ावा मिल रहा है और साथ ही साथ रोजगार सृजन से कई परिवारों का पालन पोषण चल रहा है।
रिसाइक्लिंग में योगदान
कपड़ों के अलग-अलग टुकड़ों को उनकी क्वालिटी और उनकी किस्म के आधार पर उन्हें अलग अलग किया जाता है। और अलग-अलग बोरियों में पैक करके बड़ी-बड़ी रीसाइक्लिंग कंपनियों को बेचा जाता है। वो कंपनियां इनसे धागा बनाती हैं और धागे से दुबारा कपड़ा बनता है। इस तरह से कतरन के रीसाइक्लिंग के प्रोसेस में स्लम कॉलोनियों के लोग बहुत बड़ा योगदान देते हैं।