गुरुवार, 26 अक्टूबर 2017

बने शहरी हम अपनों को छोड़ चले : प्रदीप चौहान

रोज़गार व बेहतर ज़िंदगी की तलाश मे न चाहकर भी अपना घर परिवार छोड़कर शहरों मे आने का सिलसिला वर्षों से चलता आ रहा है। पलायन करने वाले हर व्यक्ति की दर्दनाक व्यथा को इस कविता के ज़रिये बयां करने की कोशिश की गयी है।

" बने शहरी हम अपनों को छोड़ चले।"

बेहतर ज़िंदगी की तलाश में
उज्जवल भविष्य की आस में,
कई सपनों से मुँह मोड़ चले,
बने शहरी हम अपनों को छोड़ चले।

मॉ की ममता है छुटी,
पिता का फटकार छुटा,
बहन की नादान तकरार से नाता तोड़ चले,
बने शहरी हम अपनों को छोड़ चले।

बिटिया की पढ़ाई के ख़ातिर
बहन की सगाई के ख़ातिर,
पत्नि के सपनों के घर के ईंट चुनने चले,
बने शहरी हम अपनों को छोड़ चले।

यारों की यारी छुटी
अमिया की फुलवारी छुटी,
दोस्तों संग बटोरी ठहाकों की गठरी हम तोड़ चले,
बने शहरी हम अपनों को छोड़ चले।

बथुआ सरसों का साग छुटा,
मकई का अब न बाल टुटा,
मिटठे की कराही मे पकता कोन हम छोड़ चले,
बने शहरी हम अपनों को छोड़ चले।

नौकरी की राह ऐसी,रुपयों की चाह ऐसी
आत्म पहचान बनाने के जहदोजहद मे,
सारे रिश्ते नाते तोड़ चले,
बने शहरी हम अपनों को छोड़ चले।

ज़िंदगी का दस्तूर है ये कैसा,
कुछ पाना लगे सबकुछ खोने जैसा,
मन में यादों का लिये नासुर चले,
बने शहरी हम अपनों को छोड़ चले।

(प्रदीप चौहान)

गुरुवार, 17 अगस्त 2017

झुग्गियों में जर्जर सफ़ाई व्यवस्था: डेंगू को न्योता।

 दिल्ली सरकार डेंगू व चिकनगुनिया को रोकने के लिये किये गये उपायों कि जमकर बखान कर रही है। प्रिंटमिडीया, इलेक्ट्रोनिक मिडिया व सोशल मिडीया पर हम टेक्स पेयर्स  के करोड़ों रुपये ख़र्च किये जा रहे हैं। बार बार ये दावा किया जा रहा है कि दिल्ली तैयार है। हमें डरने की ज़रूरत नहीं है।
लेकिन धरातल पर सच्चाई कुछ और ही नजर आ रही है। दिल्ली की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ति संजय कालोनी, जो ओखला इंडस्ट्रियल एरिया मे बसी है। यहाँ लाखों मजदुर रहते हैं। यहाँ की साफ़ सफ़ाई की व्यवस्था, दिल्ली सरकार के  झुठे दावों की अलग ही पोल खोल रहे हैं।

नालों में जमा रहता है गंदा पानी।
कालोनी के मेन रोड के दोनों तरफ नाले हैं लेकिन कंपनी की साइड वाले नाले में सालों से गंदा पानी जमा है। जिसमें असंख्य मच्छर पैदा हो गये हैं । यहाँ के निवासियों को मच्छर जनित रोगों का हमेशा ख़तरा रहता है। मलेरिया, बुखार, चिकनगुनिया व डेंगू जैसी ख़तरनाक बीमारियों को, सफ़ाई न करके न्योता दिया जा रहा है।

टूटे हुए नालों की सालों से कोइ मरम्मत नहीं ।
कई साल से नाले टुटे पड़े है जिसकी वजह से उनकी चौड़ाई बढ़ गयी है। पानी का ठहराव ज़्यादा रहता है। सफ़ाई करनेवालों को बहुत दिक़्क़तों का सामना करना पड़ता है। बच्चों के गिरने का ख़तरा भी रहता है। कई बार तो बच्चों को चोटें भी आ चुकी हैं लेकिन सरकार की तरफ से ईनकी मरम्मत के लिये कोइ ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

नालों के पानी की निकासी का कोई प्रबन्ध नहीं
कम्पनी की साईड वाला नाला हमेशा गंदे पानी से भरा रहता है क्योंकि ईस पानी को निकलने का रास्ता नहीं है। साफ़ सफ़ाई नियमित अंतराल पर न होने से रास्ते ब्लॉक हो गये हैं। पानी के सड़ने की वजह से असंख्य किटीणु पैदा हो गये हैं और बदबु फैली रहती है जिससे तमाम जिवाड़ुजनित बीमारियॉ फैल रही हैं। ढहरे हुए पानी में डेंगू व चिकनगुनिया के मच्छर पैदा हो रहे है और क्षेत्र के लोगों को बिमार कर रहे है। क्षेत्र के पार्षद व अन्य कन्सर्न विभाग को इससे कोइ लेना देना नहीं है।

पेशाबघर में फैले गंदगी से लोग परेशान
कॉलोनी के मेन रोड पर दो पेशाबघर हैं पर यहाँ हमेशा गंदगी फैली रहती है। सफ़ाई नियमित अंतराल पर न होने की वजह से हमेशा पानी रोड पर व अन्य दिशा मे बहता है। गंदी बदबु कि वजह से लोगों का आना जाना मुश्किल हो गया है।
लेकिन इसकी कोई सफ़ाई नहीं की जा रही है।

कालोनी के निवासी, यहाँ की साफ़ सफ़ाई की जर्जर व्यवस्था से बहुत परेशान हैं। यहाँ तमाम बीमारियॉ फैल रही हैं। लेकिन यहॉ के पार्षद, विधायक या दिल्ली की सत्ता पे क़ाबिज़ सरकार का कोइ ध्यान नहीं जा रहा।

निवासियों का कहना है कि इलेक्शन मे हमारा वोट लेने के लिये तमाम वादे किये जाते है।लेकिन जितने के बाद हमें लात मार दिया जाता है। झुग्गियों को सिर्फ़ वोटबैक के रुप मे प्रयोग किया जाता है। यहाँ की समस्याओं को कभी ख़त्म नहीं किया जाता।
 कम्प्लेंटस करने व नेताओं के आगे बार बार हाथ जोड़ने से लोग अब तंग आ गये है और ये समझने लगे हैं कि अब क्षेत्र के लोगों को एकत्रित होकर अपनी परेशानियों को दुर करने के लिये आवाज़ उठानी होगी और अपने अधिकारो का संघर्ष तेज़ करना होगा।

 

नशे की दलदल में डूबता बचपन : प्रदीप चौहान

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