बेटियां बहुत संभाली है अब बेटों की बारी है।
देश के बेहतरीन स्वयं सेवी संस्थानों में से एक, दीपालया संस्था के द्वारका शाखा में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला जहां 8 मार्च को बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा था। महिलाओं ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बढ़.चढ़कर हिस्सा लिया और ग्रुप नृत्य के जरिए, बच्चियों ने नुक्कड़ नाटक के जरिए, कविताओं के जरिए अपनी खुशी का इजहार किया।
कुछ महिलाओं ने अपने जीवन में होने वाले परिवर्तनों को सांझा किया। कुछ ने अपने जीवन में होने वाले उतार-चढ़ाव से ऊपर उठकर, नारी शक्ति को पहचानते हुए, उसकी रक्षा के लिए किए गए अपने संघर्षों को भी साझा किया। कुछ माताओं ने यह भी शेयर किया कि उन्होंने अपने जीवन में अपनी बेटियों को सही मार्ग दिखाने, उन्हें सिखाने व पढ़ाने में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया जिसकी बदौलत बेटियों ने परिवार व समाज में एक अच्छा मुकाम हासिल किया है। लेकिन दूसरी तरफ चिंता थी कि हम अपने बेटों को उनकी हद समझाने में असफल हो गए।
बेटे आजकल समाज से कटते जा रहे हैं। छोटी छोटी उम् में नशे का शिकार होते जा रहे। शिक्षा को ठुकराकर गलत आदतों को अपना रहे हैं। जिंदगी में मेहनत से दूर भागकर छोटा मार्ग अपनाना चाहते हैं। और इसलिए चोरी झपटमारी जैसे अपराधों में लिप्त होते जा रहे हैं।
कुछ महिलाएं ने यह शेयर किया कि आज हम बेटियों को बाहर भेजने से डरते हैं कि कहीं वह छेड़छाड़ और इस तरह के तमाम अपराधों शिकार ना हो जाए। महिलाओं ने यह भी शेयर किया की छेड़छाड़ की घटनाओं में लड़के, नौजवान लिप्त होते हैं वह किसी ना किसी के भाई और बेटे ही होते हैं। इसलिए अपने बेटों को यह समझाना है कि तुम्हारी सीमा क्या है। किसी बेटी के साथ कुछ होता है तो यह नहीं भूलना चाहिए कि वह भी किसी की बहन है और किसी की मां है।
सभा में मौजूद 150 से 200 महिलाओं ने लंबी चर्चा के बाद एक दूसरे को कुछ समाधान सुझाएं और मिलकर यह संकल्प लिया कि बेटों के कान पकड़कर उन्हें सही राह पर लाना होगा।
इस सुनहरे मौके पर महिलाओं का लिया हुआ यह संकल्प समाज में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। आज हर परिवार में, हर महिला, हर मां को यही संकल्प लेना चाहिए की बेटों को सही राह पर रखा जाए। सही राह पर लाया जाए और उन्हें उनकी हद, उनकी सीमा समझाई जाए।
