दिल्ली की स्लम बस्तियों में दस-दस साल के बच्चे, छोटी उम्र में गांजा, शराब व अन्य बुरी आदतों के शिकार हो रहे हैं। जिस उम्र में ज्यादातर बच्चे खेलने-कूदने, पढ़ने-लिखने और नए-नए हुनर सीखकर उज्वल भविष्य बनाने में व्यस्त होते हैं, उस उम्र में कुछ बच्चे अंधकार की तरफ जा रहे हैं। इनका कोई सपना नहीं हैं। परिवार और समाज से दूरी और एकांत इन्हें पसंद आता है।
नशे की लत, न केवल उसका सेवन करने वाले को प्रभावित करती है बल्कि परिवारों को भी प्रभावित करती है। परिवार के सदस्यों को सामाजिक अपमान व मानसिक तनाव झेलना पड़ता है। आर्थिक बोझ का सामना करना पड़ता है। परिवार के सदस्य असहाय या उदास हो जाते हैं।
भारत में, एक गैर सरकारी संगठन के सर्वे से पता चला है कि इलाज के लिए आने वाले 63.6% रोगियों को, 15 वर्ष से कम उम्र में नशे की लत लग चुकी होती है। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, भारत में नशीली दवाओं और मादक द्रव्यों के सेवन में शामिल लोगों में से 13.1% लोग, 20 वर्ष से कम आयु के होते हैं।
गांजा, शराब, अफीम, हेरोइन आदि भारत में, बच्चों द्वारा मुख्य रूप से उपयोग में लाये जाने वाले नशे के प्रकार हैं। एक अन्य सर्वे से पता चलता है कि सभी शराब, भांग और अफीम उपयोगकर्ताओं में से 21%, 3% और 0.1% अठारह वर्ष से कम आयु के हैं।
पूर्वी दिल्ली नगर निगम (ईडीएमसी) द्वारा हाल ही में जारी एक सर्वे रिपोर्ट से पता चला है कि राष्ट्रीय राजधानी में हर छह में से एक बच्चा किसी न किसी रूप में, नशीले पदार्थों का उपयोग करता है। आइये बच्चों और किशोरों में नशे के विभिन्न कारणों को बारीकी से समझने को कोशिश करते हैं।
नशीले पदार्थों का आसानी से उपलब्ध होना।
नई एक्साइज पॉलिसी के कारण, 17 नवम्बर से दिल्ली में 850 नए प्राइवेट ठेके खुल गए हैं। रेजिडेंशियल एरिया, जहाँ ज्यादा आबादी रहती हैं उनके नजदीक, और ठेके खुलने की वजह से शराब की उपलब्धता पहले से ज्यादा आसान हो गयी है। इन्हें सुबह 10 से रात 10 बजे तक खुलने की आजादी है। होम डिलीवरी की सुविधाएं भी देने लगे हैं।
इसके अलावा, गैर कानूनी तरीके से झुग्गी बस्तियों में हर दूसरी गली में, शराब की दुकानें मौजूद है जहां पर धड़ल्ले से शराब बेची जाती है। यहां पर कोई नियम नहीं होता की शराब खरीदने वाले की उम्र कितनी हो। जो भी आता है उसको आसानी से दे दिया जाता है। 24 घंटे सेवा उपलब्ध रहती है। राजनीति और पुलिस की सांठगांठ से ये धंधा गली-गली पसरा हुआ है।
नशीले पदार्थों के आसानी से उपलब्ध होने की वजह से छोटे-छोटे बच्चे भी इसकी तरफ आकर्षित हो रहे हैं। स्लम बस्तियों में बसने वाली भावी पीढ़ी नशे का शिकार हो रही है।
सबकी सांठगांठ से नशे के व्यापार का बढ़ना।
स्लम कालोनियों में खुलेआम गांजा और शराब बेची जाती है। गली-गली कच्ची शराब की दुकानें मौजूद हैं। राजनीति, पुलिस और नौकरशाहों की मजबूत सांठ-गांठ से नशे का व्यापार फल-फूल रहा है।
गलियों में गांजा मिलना या बिकना आम बात है। इसकी उपलब्धता में कोई कमी नहीं आती। बेचने वालों को थोक के भाव आसानी से उपलब्ध होता है। जितनी चाहिए उतना उपलब्ध हो जाता है।
खुलेआम बेचने पर उन्हें किसी भी तरह के रोक टोक का सामना नहीं करना पड़ता। सबका हिस्सा फिक्स होता है। अगर किसी भी तरह का विरोध भी हो तो ऊंची पहुंच का फायदा उठाकर आसानी से बच जाते हैं और अपना काम करते रहते हैं।
गांजा का असर मस्तिष्क पर होना।
स्लम के बच्चों के लिए सबसे खतरनाक नशा है गांजा का नशा। यह नशा सबसे सस्ता होता है और आसानी से उपलब्ध है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, एबीसीडी 2018 इंडेक्स से पता चलता है कि दिल्ली में 38.3 टन गांजा की खपत सालाना होती है।
दुनिया के टॉप 10 गांजा खपत करने वाले शहरों में दिल्ली तीसरे नम्बर पर है। इसकी उपलब्धता में कोई कमी नहीं है। खरीदने वाले कि उम्र की कोई पाबन्दी नहीं होती।
बच्चों के ग्रुप से कोई भी 50 से 100 रुपये का अरेंजमेंट करके अपने और बाकियों के लिए गांजा खरीद लेता है। यह झुंड पार्कों में या किसी भी सुनसान जगह पर पहुंचकर गांजा पीता हैं। इसका सेवन करने के बाद मुँह से महक नहीं आती जैसा कि शराब या बियर पीने के बाद आती है।
एक या दो बार से ज्यादा गांजे का सेवन करने के बाद, युथ इस नशे का आदी हो जाता है। एक बार आदत पड़ जाने के बाद, किसी के कुछ कहने, किसी के रोक-टोक या समझाने का इन पर कोई असर नहीं पड़ता। ये अलग ही दुनिया में खुद को महसूस करते हैं। पार्कों व सुनसान जगहों पर बच्चों और युवावों के समूह का गांजा पीते हुए दिखना, आम नज़ारा है।
शिक्षा संस्थानों का कोविड के कारण बंद होने का पड़ रहा बुरा प्रभाव।
बच्चों और नौजवानों का ज्यादातर समय कॉलोनियों से बाहर, शिक्षा संस्थानों में बीतता था। कोरोना महामारी की लगातार दो लहरों और लॉकडाउन की वजह से, ज्यादातर शिक्षा संस्थान बंद हैं। बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई तो चल रही है लेकिन डिवाइसेज और दूसरे रिसोर्सेज की कमी है। पढ़ाई के प्रति बेरुखी बढ़ी है।
अगस्त में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा था कि करीब 15 करोड़ बच्चे इस समय शिक्षा व्यवस्था से बाहर हैं। यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन ने इसी तरह के ड्रॉपआउट नंबरों की सूचना दी। कोविड -19 के कारण अस्थायी स्कूल बंद होने के प्रभाव से ये चुनौतियाँ बढ़ गईं। महामारी जितना लंबा चलेगा, ये संख्या उतनी ही बढ़ेगी।
स्लम कॉलोनियों में ड्रोपआउट बच्चों की संख्या ज्यादा है। कमरों में या गलियों में खेलने के लिए जगह कम होने का नतीजा यह होता है की बच्चों का ग्रुप पार्कों में या जहां भी जगह मिले, वहां खेलने पहुंच जाता है। ग्रुप के कुछ बच्चों को अगर शराब या गांजा पीने की आदत है तो वे अन्य बच्चों को भी आकर्षित करते हैं।
खाली होना, अपने अंदर कई अवगुणों को लेकर आता है। बच्चे कई सारे गलत आदतों का शिकार हो रहे हैं। शिक्षा संस्थान अगर बंद नहीं होते तो नशा करने वाले बच्चों की संख्या और कम होती।
रोजी रोटी की मजबूरी से कमजोर हो रही परवरिश।
किसी भी समाज़ में बुराई तब तक बढ़ती रहती है जब तक उसका विरोध न हो। अभिभावकों की निगरानी और समय समय पर रोक टोक से, बच्चे सही राह पर चलते रहते हैं। महंगाई की लगातार बढ़ोतरी और तनख्वाह में कटौती के कारण घर का खर्च चलाना मुश्किल होता जा रहा है। पिता के साथ-साथ माँ को भी 12-12 घंटे काम पर रहना पड़ता है।
काम के घंटों में बढ़ोतरी, थकान व अन्य कारणों से बच्चों के साथ व्यतीत होने वाले समय की कमी हो रही है। बच्चों की निगरानी नहीं हो पा रही है। नतीजा यह होता है कि ज्यादातर बच्चे जो घर पर रहते हैं, वो गलत संगत का शिकार हो रहे हैं। गरीबी और बेरोजगारी से परवरिश पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।
नशे के शिकार बच्चों से घृणा की प्रवृति।
नशे के शिकार बच्चों से आमतौर पर दूसरे बच्चे या लोग बात तक करना पसंद नहीं करते। उनसे घृणा करने की प्रवृत्ति जन्म ले लेती है। इनके अपने दोस्त तक, अभिभावकों के दबाव के कारण, इनसे कटने लगते हैं। नशे के शिकार बच्चों में अगर सुधरने की इच्छा भी हो तो वे सुधर नहीं पाते क्योंकि मदद करने वाले आगे नहीं आते।
नतीजा यह होता है कि ये बच्चे परिवार और समाज से कटने लगते हैं। कहीं ना कहीं अच्छे कहे जाने वाले लोग, जाने अनजाने में इसे कम करने की बजाय, बढ़ाने में अपना योगदान दे जाते हैं। ऐसे बच्चों से बात करने, उन्हें सुनने और मार्गदर्शन देने की जरूरत है लेकिन घृणा की प्रवृति की वजह से जाने अनजाने में इसे बढ़ाया जा रहा है।
सरकार और गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) के भागीदारी की कमी।
भारत में समस्या यह है कि स्कूलों में या स्कूल से बाहर बच्चों के लिए, नशीले पदार्थों के उपयोग को रोकने के लिए कोई असरदार कार्यक्रम नहीं हैं। भारत में मादक द्रव्यों के सेवन की नीति नहीं है। सरकारी नशा मुक्ति केंद्रों की सक्रियता और समर्थता की कमी है। सरकारें नशे के कारोबार को रोकने के लिए बिल्कुल भी चिंतित नही दिखती हैं। इस समस्या को खत्म या कम करने के लिए कोई बड़ा मुहिम चलाने की बजाय इससे धन कमाने पर ज्यादा ध्यान देती रही हैं।
वही दूसरी तरफ, देश में गैर सरकारी संगठनों ने बड़ी-बड़ी समस्याओं के समाधान और उन्हें बढ़ने से रोकने के लिए जागरूकता अभियान चलाएं हैं। उनके द्वारा जमीनी स्तर पर काम करने और लगातार प्रयासों की वजह से समाज में सैकड़ों बड़े बदलाव आए हैं। लेकिन नशा मुक्ति पर काम करने से तमाम गैर सरकारी संगठन कतराते हैं।
दिल्ली और देश में अन्य मुद्दों के मुकाबले बच्चों की नशा मुक्ति पर काम करने वाले एनजीओ की संख्या कम है। नतीजा ये है कि समाज में नशे का व्यापार और इसका उपयोग लगातार बढ़ रहा है। भावी पीढ़ी नशे से बर्बाद हो रही है।
समाधान।
किशोरावस्था में बच्चों के इस दलदल में फंसने का बड़ा कारण, नशीले पदार्थों का आसानी से उपलब्ध होना है। परिवार में सबसे ज्यादा महिलाएं ही किसी भी तरह के नशे के दुष्परिणामों का शिकार होती हैं। अपनी भावी पीढ़ी को नशे के दलदल से बचाने में माताओं का बहुत बड़ा योगदान हो सकता है। आज जरूरत है की माताएं आगे आएं। शासन और प्रशासन से आग्रह करें की गली-गली में इसकी उपलब्धता बंद की जाए। जरूरत है सरकारों के खिलाफ आवाज बुलंद करने की और इसके खुलेआम बिकने पर रोक लगाने की ताकि इस तेजी से बढ़ते धंधे से उनका परिवार बच सकें।
नशे के सेवन को "शान की बात" या "बिंदास काम" की तरह प्रोजेक्ट किया जाता है। नशा करने को "एक निंदनीय काम" की तरह प्रस्तुत करने की जरूरत है। इससे होने वाले नुकसानों को व्यापक रूप से लोगों के बीच में ले जाने की जरूरत है। प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया पर लगातार बड़े कैंपेन से ही इस समस्या या इस बुराई के प्रति समाज में जागरूकता फैलाया जा सकता है।
आज जरूरत है बच्चों और किशोरों की एनर्जी को सही दिशा में लगाने की। क्रिएटिव कामों में बच्चों को व्यस्त करने की। ऐसे पाठ्यक्रम और तरीके खोजा जाए और अमल में लाया जाए जिससे खेल-खेल में बच्चों का विकास हो। स्किल डेवलपमेंट एक्टिवीटी को बढ़ावा दिया जाए।
समय-समय पर पीड़ित बच्चों और उनके अभिभावकों की काउंसलिंग की जाए। नशे के शिकार बच्चों के साथ ममता पूर्ण व्यवहार और सहयोग किया जाए। स्पोर्ट्स, स्किल डेवलपमेंट, काउन्सलिंग और उपचार के माध्यम से नशा मुक्ति की ओर ले जाने से परिवर्तन आएगा।

