शुक्रवार, 21 जनवरी 2022

नशे की दलदल में डूबता बचपन : प्रदीप चौहान

दिल्ली की स्लम बस्तियों में दस-दस साल के बच्चे, छोटी उम्र में गांजा, शराब व अन्य बुरी आदतों के शिकार हो रहे हैं। जिस उम्र में ज्यादातर बच्चे खेलने-कूदने, पढ़ने-लिखने और नए-नए हुनर सीखकर उज्वल भविष्य बनाने में व्यस्त होते हैं, उस उम्र में कुछ बच्चे अंधकार की तरफ जा रहे हैं। इनका कोई सपना नहीं हैं। परिवार और समाज से दूरी और एकांत इन्हें पसंद आता है। 


नशे की लत, न केवल उसका सेवन करने वाले को प्रभावित करती है बल्कि परिवारों को भी प्रभावित करती है। परिवार के सदस्यों को सामाजिक अपमान व मानसिक तनाव झेलना पड़ता है। आर्थिक बोझ का सामना करना पड़ता है। परिवार के सदस्य असहाय या उदास हो जाते हैं।


भारत में, एक गैर सरकारी संगठन के सर्वे से पता चला है कि इलाज के लिए आने वाले 63.6% रोगियों को, 15 वर्ष से कम उम्र में नशे की लत लग चुकी होती है। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, भारत में नशीली दवाओं और मादक द्रव्यों के सेवन में शामिल लोगों में से 13.1% लोग, 20 वर्ष से कम आयु के होते हैं। 


गांजा, शराब, अफीम, हेरोइन आदि भारत में, बच्चों द्वारा मुख्य रूप से उपयोग में लाये जाने वाले नशे के प्रकार हैं। एक अन्य सर्वे से पता चलता है कि सभी शराब, भांग और अफीम उपयोगकर्ताओं में से 21%, 3% और 0.1% अठारह वर्ष से कम आयु के हैं।


पूर्वी दिल्ली नगर निगम (ईडीएमसी) द्वारा हाल ही में जारी एक सर्वे रिपोर्ट से पता चला है कि राष्ट्रीय राजधानी में हर छह में से एक बच्चा किसी न किसी रूप में, नशीले पदार्थों का उपयोग करता है। आइये बच्चों और किशोरों में नशे के विभिन्न कारणों को बारीकी से समझने को कोशिश करते हैं।


नशीले पदार्थों का आसानी से उपलब्ध होना

नई एक्साइज पॉलिसी के कारण, 17 नवम्बर से दिल्ली में 850 नए प्राइवेट ठेके खुल गए हैं। रेजिडेंशियल एरिया, जहाँ ज्यादा आबादी रहती हैं उनके नजदीक, और ठेके खुलने की वजह से शराब की उपलब्धता पहले से ज्यादा आसान हो गयी है। इन्हें सुबह 10 से रात 10 बजे तक खुलने की आजादी है। होम डिलीवरी की सुविधाएं भी देने लगे हैं। 


इसके अलावा, गैर कानूनी तरीके से झुग्गी बस्तियों में हर दूसरी गली में, शराब की दुकानें मौजूद है जहां पर धड़ल्ले से शराब बेची जाती है। यहां पर कोई नियम नहीं होता की शराब खरीदने वाले की उम्र कितनी हो। जो भी आता है उसको आसानी से दे दिया जाता है। 24 घंटे सेवा उपलब्ध रहती है। राजनीति और पुलिस की सांठगांठ से ये धंधा गली-गली पसरा हुआ है।


नशीले पदार्थों के आसानी से उपलब्ध होने की वजह से छोटे-छोटे बच्चे भी इसकी तरफ आकर्षित हो रहे हैं। स्लम बस्तियों में बसने वाली भावी पीढ़ी नशे का शिकार हो रही है। 


सबकी सांठगांठ से नशे के व्यापार का बढ़ना

स्लम कालोनियों में खुलेआम गांजा और शराब बेची जाती है। गली-गली कच्ची शराब की दुकानें मौजूद हैं। राजनीति, पुलिस और नौकरशाहों की मजबूत सांठ-गांठ से नशे का व्यापार फल-फूल रहा है। 

गलियों में गांजा मिलना या बिकना आम बात है। इसकी उपलब्धता में कोई कमी नहीं आती। बेचने वालों को थोक के भाव आसानी से उपलब्ध होता है। जितनी चाहिए उतना उपलब्ध हो जाता है। 


खुलेआम बेचने पर उन्हें किसी भी तरह के रोक टोक का सामना नहीं करना पड़ता। सबका हिस्सा फिक्स होता है। अगर किसी भी तरह का विरोध भी हो तो ऊंची पहुंच का फायदा उठाकर आसानी से बच जाते हैं और अपना काम करते रहते हैं।


गांजा का असर मस्तिष्क पर होना

स्लम के बच्चों के लिए सबसे खतरनाक नशा है गांजा का नशा। यह नशा सबसे सस्ता होता है और आसानी से उपलब्ध है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, एबीसीडी 2018 इंडेक्स से पता चलता है कि दिल्ली में 38.3 टन गांजा की खपत सालाना होती है। 


दुनिया के टॉप 10 गांजा खपत करने वाले शहरों में दिल्ली तीसरे नम्बर पर है। इसकी उपलब्धता में कोई कमी नहीं है। खरीदने वाले कि उम्र की कोई पाबन्दी नहीं होती। 


बच्चों के ग्रुप से कोई भी 50 से 100 रुपये का अरेंजमेंट करके अपने और बाकियों के लिए गांजा खरीद लेता है। यह झुंड पार्कों में या किसी भी सुनसान जगह पर पहुंचकर गांजा पीता हैं। इसका सेवन करने के बाद मुँह से महक नहीं आती जैसा कि शराब या बियर पीने के बाद आती है।


एक या दो बार से ज्यादा गांजे का सेवन करने के बाद, युथ इस नशे का आदी हो जाता है। एक बार आदत पड़ जाने के बाद, किसी के कुछ कहने, किसी के रोक-टोक या समझाने का इन पर कोई असर नहीं पड़ता। ये अलग ही दुनिया में खुद को महसूस करते हैं। पार्कों व सुनसान जगहों पर बच्चों और युवावों के समूह का गांजा पीते हुए दिखना, आम नज़ारा है। 


शिक्षा संस्थानों का कोविड के कारण बंद होने का पड़ रहा बुरा प्रभाव।

बच्चों और नौजवानों का ज्यादातर समय कॉलोनियों से बाहर, शिक्षा संस्थानों में बीतता था। कोरोना महामारी की लगातार दो लहरों और लॉकडाउन की वजह से, ज्यादातर शिक्षा संस्थान बंद हैं। बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई तो चल रही है लेकिन डिवाइसेज और दूसरे रिसोर्सेज की कमी है। पढ़ाई के प्रति बेरुखी बढ़ी है।


अगस्त में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा था कि करीब 15 करोड़ बच्चे इस समय शिक्षा व्यवस्था से बाहर हैं। यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन ने इसी तरह के ड्रॉपआउट नंबरों की सूचना दी। कोविड -19 के कारण अस्थायी स्कूल बंद होने के प्रभाव से ये चुनौतियाँ बढ़ गईं। महामारी जितना लंबा चलेगा, ये संख्या उतनी ही बढ़ेगी। 


स्लम कॉलोनियों में ड्रोपआउट बच्चों की संख्या ज्यादा है। कमरों में या गलियों में खेलने के लिए जगह कम होने का नतीजा यह होता है की बच्चों का ग्रुप पार्कों में या जहां भी जगह मिले, वहां खेलने पहुंच जाता है। ग्रुप के कुछ बच्चों को अगर शराब या गांजा पीने की आदत है तो वे अन्य बच्चों को भी आकर्षित करते हैं। 


खाली होना, अपने अंदर कई अवगुणों को लेकर आता है। बच्चे कई सारे गलत आदतों का शिकार हो रहे हैं। शिक्षा संस्थान अगर बंद नहीं होते तो नशा करने वाले बच्चों की संख्या और कम होती। 


रोजी रोटी की मजबूरी से कमजोर हो रही परवरिश

किसी भी समाज़ में बुराई तब तक बढ़ती रहती है जब तक उसका विरोध न हो। अभिभावकों की निगरानी और समय समय पर रोक टोक से, बच्चे सही राह पर चलते रहते हैं। महंगाई की लगातार बढ़ोतरी और तनख्वाह में कटौती के कारण घर का खर्च चलाना मुश्किल होता जा रहा है। पिता के साथ-साथ माँ को भी 12-12 घंटे काम पर रहना पड़ता है।


काम के घंटों में बढ़ोतरी, थकान व अन्य कारणों से बच्चों के साथ व्यतीत होने वाले समय की कमी हो रही है। बच्चों की निगरानी नहीं हो पा रही है। नतीजा यह होता है कि ज्यादातर बच्चे जो घर पर रहते हैं, वो गलत संगत का शिकार हो रहे हैं। गरीबी और बेरोजगारी से परवरिश पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।


नशे के शिकार बच्चों से घृणा की प्रवृति

नशे के शिकार बच्चों से आमतौर पर दूसरे बच्चे या लोग बात तक करना पसंद नहीं करते। उनसे घृणा करने की प्रवृत्ति जन्म ले लेती है। इनके अपने दोस्त तक, अभिभावकों के दबाव के कारण, इनसे कटने लगते हैं। नशे के शिकार बच्चों में अगर सुधरने की इच्छा भी हो तो वे सुधर नहीं पाते क्योंकि मदद करने वाले आगे नहीं आते। 


नतीजा यह होता है कि ये बच्चे परिवार और समाज से कटने लगते हैं। कहीं ना कहीं अच्छे कहे जाने वाले लोग, जाने अनजाने में इसे कम करने की बजाय, बढ़ाने में अपना योगदान दे जाते हैं। ऐसे बच्चों से बात करने, उन्हें सुनने और मार्गदर्शन देने की जरूरत है लेकिन घृणा की प्रवृति की वजह से जाने अनजाने में इसे बढ़ाया जा रहा है।


सरकार और गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) के भागीदारी की कमी

भारत में समस्या यह है कि स्कूलों में या स्कूल से बाहर बच्चों के लिए, नशीले पदार्थों के उपयोग को रोकने के लिए कोई असरदार कार्यक्रम नहीं हैं। भारत में मादक द्रव्यों के सेवन की नीति नहीं है। सरकारी नशा मुक्ति केंद्रों की सक्रियता और समर्थता की कमी है। सरकारें नशे के कारोबार को रोकने के लिए बिल्कुल भी चिंतित नही दिखती हैं। इस समस्या को खत्म या कम करने के लिए कोई बड़ा मुहिम चलाने की बजाय इससे धन कमाने पर ज्यादा ध्यान देती रही हैं। 


वही दूसरी तरफ, देश में गैर सरकारी संगठनों ने बड़ी-बड़ी समस्याओं के समाधान और उन्हें बढ़ने से रोकने के लिए जागरूकता अभियान चलाएं हैं। उनके द्वारा जमीनी स्तर पर काम करने और लगातार प्रयासों की वजह से समाज में सैकड़ों बड़े बदलाव आए हैं। लेकिन नशा मुक्ति पर काम करने से तमाम गैर सरकारी संगठन कतराते हैं। 


दिल्ली और देश में अन्य मुद्दों के मुकाबले बच्चों की नशा मुक्ति पर काम करने वाले एनजीओ की संख्या कम है। नतीजा ये है कि समाज में नशे का व्यापार और इसका उपयोग लगातार बढ़ रहा है। भावी पीढ़ी नशे से बर्बाद हो रही है।


समाधान

किशोरावस्था में बच्चों के इस दलदल में फंसने का बड़ा कारण, नशीले पदार्थों का आसानी से उपलब्ध होना है। परिवार में सबसे ज्यादा महिलाएं ही किसी भी तरह के नशे के दुष्परिणामों का शिकार होती हैं। अपनी भावी पीढ़ी को नशे के दलदल से बचाने में माताओं का बहुत बड़ा योगदान हो सकता है। आज जरूरत है की माताएं आगे आएं। शासन और प्रशासन से आग्रह करें की गली-गली में इसकी उपलब्धता बंद की जाए। जरूरत है सरकारों के खिलाफ आवाज बुलंद करने की और इसके खुलेआम बिकने पर रोक लगाने की ताकि इस तेजी से बढ़ते धंधे से उनका परिवार बच सकें।


नशे के सेवन को "शान की बात" या "बिंदास काम" की तरह प्रोजेक्ट किया जाता है। नशा करने को "एक निंदनीय काम" की तरह प्रस्तुत करने की जरूरत है। इससे होने वाले नुकसानों को व्यापक रूप से लोगों के बीच में ले जाने की जरूरत है। प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया पर लगातार बड़े कैंपेन से ही इस समस्या या इस बुराई के प्रति समाज में जागरूकता फैलाया जा सकता है।


आज जरूरत है बच्चों और किशोरों की एनर्जी को सही दिशा में लगाने की। क्रिएटिव कामों में बच्चों को व्यस्त करने की। ऐसे पाठ्यक्रम और तरीके खोजा जाए और अमल में लाया जाए जिससे खेल-खेल में बच्चों का विकास हो। स्किल डेवलपमेंट एक्टिवीटी को बढ़ावा दिया जाए। 


समय-समय पर पीड़ित बच्चों और उनके अभिभावकों की काउंसलिंग की जाए। नशे के शिकार बच्चों के साथ ममता पूर्ण व्यवहार और सहयोग किया जाए। स्पोर्ट्स, स्किल डेवलपमेंट, काउन्सलिंग और उपचार के माध्यम से नशा मुक्ति की ओर ले जाने से परिवर्तन आएगा। 


रविवार, 26 दिसंबर 2021

स्लम, कतरन और रोज़गार : प्रदीप चौहान

ओखला इंडस्ट्रियल एरिया फेस 2 के बीचो बीच बसे छोटे बड़े स्लम बस्तियों में एक बड़ी आबादी बसती है। ऐसी झुग्गी बस्तियाँ जहां एक्सपोर्ट से निकले हुए कपड़े का कचरा लाया जाता है और उस की वैरायटी और क्वालिटी के आधार पर अलग अलग किया जाता है। अप-साइकलिंग से विभिन्न चिझें तैयार की जाती हैं। रीसाइक्लिंग के लिए आगे भेजा जाता है। इस पूरे प्रोसेस में कतरन की लोडिंग, अनलोडिंग, छटाई, उसकी पैकिंग, सिलाई, बिक्री आदि के प्रोसेस में कुछ लोग जिन्हें कबाड़ी कहा जाता है, स्वरोजगार करते हैं और अपने साथ साथ सैकड़ों लोगों को रोजगार देते हैं जिनमें मुख्यतः अशिक्षित ग़रीब महिलाएं शामिल हैं।

 कपड़े के कचरे के निपटारे से व्यापार

दिल्ली एनसीआर और आसपास के इंडस्ट्री एरिया की एक्सपोर्ट हाउसेस में कपड़े का जो कचरा बच जाता है उस कचरे को संजय कॉलोनी व अन्य कॉलोनियों के कबाड़ी, वजन के हिसाब से उन्हें खरीद लेते हैं। उसके बाद कपड़े की क्वालिटी या कपड़े की किस्म के आधार पर अलग अलग किया जाता है।  
छंटाई करने के बाद अलग-अलग बोरियों में पैक किया जाता है। और इसको बड़े इंडस्ट्रीज जहां पर रीसाइक्लिंग होता है वहां पर बेचा जाता है। एक पर्टिकुलर मार्जिन से ये सारा बिजनेस चलता है। यह प्रोसेस एक तरफ कपड़ों के कचरा का रिसाइकल करने में मदद कर रहा है वहीं दूसरी तरफ कचरे से लोगों के लिए रोजगार पैदा कर रहा है।

 महिलाओं के लिए रोज़गार

आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की महिलाएं जिनकी शिक्षा बहुत कम होती है या उम्र ज्यादा होती है उनके लिए रोजगार का एक बहुत बड़ा साधन है। जिन महिलाओं को उनके शिक्षा की वजह से या उम्र की वजह से या स्किल की वजह से आसपास की कंपनियों में काम नहीं मिल पाता उन महिलाओं के लिए कतरन की छटाई करना एक सहायक रोजगार के रूप में उभरा है। 
इससे महिलाएं अपने परिवार को आर्थिक सपोर्ट कर पाती हैं। बच्चों की परवरिश को उनकी शिक्षा में मदद कर पाती हैं। संजय कॉलोनी और आसपास की कॉलोनियों के लिए रीसाइक्लिंग का यह काम एक बड़े विकल्प के रूप में उभर कर सामने आया है जिससे महिलाओं को बिना किसी क्वालिफिकेशन व सर्टिफिकेट की आवश्यकता के उन्हें काम देता है।
छंटाई का काम करने वाली महिलाओं को दिहाड़ी के रूप में 300 से लेकर ₹400 तक मिलता है। जितने दिन काम करती हैं इतने दिन का पैसा मिलता है। इसमें बहुत ज्यादा बंधन नहीं होता जिसके पास भी माल यानी कतरन आता है उसके पास कर लेती हैं। रोज़ाना या हफ्ते में उनको उनका मेहनताना मिल जाता है।

 पुनर्प्रयोग से स्वरोजगार (livelihood by Upcycling)

कपड़ों के कतरन के टुकड़ों में बड़े बड़े पीस भी होते हैं। बड़े साइज के टुकड़ों को अलग किया जाता है। संजय कॉलोनी और आसपास की कॉलोनियों में घर घर मशीनें बिठाकर लोग कतरन से स्कर्ट, टीशर्ट या अन्य रेडीमेड कपड़े तैयार करते हैं। कई लोग कपड़े की कतरन से दरिया, डोर मैट, बाथ मैट, फ्रीज़ कवर, कपड़े के थैले इत्यादि तैयार करते हैं। 

तैयार माल को थोक में सीलमपुर, गांधी नगर या अन्य जगहों से आए व्यापारियों को थोक रेट में बेच दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में अप-साइकिलिंग से स्वरोजगार को बढ़ावा मिल रहा है और साथ ही साथ रोजगार सृजन से कई परिवारों का पालन पोषण चल रहा है।

 रिसाइक्लिंग में योगदान

कपड़ों के अलग-अलग टुकड़ों को उनकी क्वालिटी और उनकी किस्म के आधार पर उन्हें अलग अलग किया जाता है। और अलग-अलग बोरियों में पैक करके बड़ी-बड़ी रीसाइक्लिंग कंपनियों को बेचा जाता है। वो कंपनियां इनसे धागा बनाती हैं और धागे से दुबारा कपड़ा बनता है। इस तरह से कतरन के रीसाइक्लिंग के प्रोसेस में स्लम कॉलोनियों के लोग बहुत बड़ा योगदान देते हैं।

बुधवार, 20 अक्टूबर 2021

स्लम युवाओं का अंधकारमय भविष्य: प्रदीप चौहान

एक के बाद दूसरी कोरोना की लगातार दो लहरों का बुरा प्रभाव झुग्गी बस्तियों में देखने को मिलता है। ज्यादातर लोगों की नौकरियां चली गई हैं। छोटे-मोटे रोजगार करने वालों के रोजगार ठप पड़ गए हैं। असंगठित मज़दूरों की श्रेणी में आने वाली ज्यादातर आबादी झुग्गी बस्ती में बस्ती है। 
 स्लम युवावों के द्वारा अपने जीवन और करियर को लेकर बनायी गई भविष्य की योजनाएं फेल हो रही हैं। आगे का रास्ता साफ नजर नहीं आता। काम की कमी से परेशान, खाली, बेकार पड़ा नौजवान कई गलत आदतों व नशे का शिकार हो रहा है। 

 नशे के व्यापार का बढ़ना बड़ी समस्या।

स्लम कालोनियों में खुलेआम शराब बेची जाती है। गली गली कच्ची शराब की दुकानें मौजूद हैं। राजनीति, पुलिस और नौकरशाहों की मजबूत सांठ गांठ से नशे का व्यापार फल फूल रहा है। गलियों में गांजा मिलना या बिकना आम बात है। 
एक या दो बार से ज्यादा गांजे का सेवन करने के बाद युथ इस नशे का आदी हो जाता है। पार्कों, सुनसान जगहों पर युवावों के समूह का गांजा पीते हुए दिखना आम नाज़ारा है। 
नशीले पदार्थों का आसानी से उपलब्ध होने की वजह से छोटे छोटे बच्चे भी इसकी तरफ आकर्षित हो रहे हैं। स्लम बस्तियों में बसने वाली भावी पीढ़ी नशे से बर्बाद हो रही है।
 जुआ और सट्टे के बढ़ते साम्राज्य का शिकार हो रहा युवा।

स्लम कालोनियों में नौजवानों का एक बड़ा हुजूम गलियों,  नुक्कड़ों और खाली रास्तों पर इकट्ठा होता है और विभिन्न ऑनलाइन सट्टा एप पर पैसा लगाता है। 
आजकल यह बहुत आम बात है। 10 साल के बच्चे भी इसमें निपुण हैं। एक के बाद एक युवाओं का कई ग्रुप तैयार हो जाते हैं। एक बार पैसा लगाने के बाद वह बार-बार सट्टा लगाते हैं।
 
जिसका नम्बर आ गया वो पार्टी देता है। खुलेआम शराब पी और पिलाई जाती है। देर रात तक इन्हीं ग्रुप में गाली गलौज करने,  आपस में झगड़ते और मारपीट की खबरें आम बात हो गई है। 
इसके अलावा युवाओं के इस नशे का फ़ायदा उठाते हुए कुछ लोकल दबंग या यूं कहें कि ऊपर तक पहुंच रखने वाले लोग, अलग-अलग माध्यमों से सट्टे का एक साम्राज्य चलाते हैं। जिसका शिकार आज की युवा पीढ़ी हो रही है।

 ऑनलाइन गेम से समय की हो रही बर्बादी।

स्कूल जाने वाले छोटे बच्चे हों या कॉलेज जाने वाले नौजवान, सबके लिए मोबाइल ऑनलाइन पढ़ाई के लिए पहली जरूरत बनकर उभरा है। अभिभावकों की निगरानी ना होने की वजह से बच्चों को सोशल मीडिया और गेम्स की तरफ जाने का मौका मिल जाता है। 
चाहे पब्जी हो, फौजी या बात करें हम फ्री फायर की। गलियों में या खाली जगहों पर इकट्ठा होकर दो या दो से ज्यादा नौजवान आपस में प्लेयर्स लेते हैं और गेम खेलते हैं।इसका नशा इस कदर है कि वह पूरे पूरे दिन उसी गेम्स में लगे रहते हैं जबतक कि उनका इंटरनेट डेटा खत्म ना हो जाए। 

गेम्स खेलना एक नशे की तरह उभरा है और युवाओं का कीमती समय जो उनकी पढ़ाई में, फिजिकल एक्टिविटी में या उनके डेवलपमेंट में लगना चाहिए था वह समय यूं ही गेम्स खेल कर बर्बाद हो रहा है।

 शिक्षा संस्थानों के बंद होने का पड़ रहा बुरा प्रभाव।

बच्चों और नौजवानों का ज्यादातर समय कॉलोनियों से बाहर शिक्षा संस्थानों में बीतता था। कोरोना महामारी की लगातार दो लहरों और लॉकडाउन की वजह से ज्यादातर शिक्षा संस्थान बंद हैं। बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई तो चल रही है लेकिन डिवाइसेज और दूसरे रिसोर्सेज की कमी है। 

एक घर में दो या दो से ज्यादा बच्चों के होने की वजह से डिवाइस की कमी होना लगभग हर घर की कहानी है। इसका असर यह होता है कि एक बच्चा ही लगातार क्लास कर पाता है। बाकी बच्चों के लिए क्लास करना बहुत मुश्किल हो जाता है। खाली होना अपने अंदर कई अवगुणों को लेकर आता है। बच्चे कई सारे गलत आदतों का शिकार हो रहे हैं।

 रोजी रोटी की जिम्मेदारी से कमजोर हो रही परवरिश

बेरोज़गारी की मार और लगातार तनख्वाह कम होने की वजह से परिवार का खर्च चलाने के लिए परिवार की एक से ज्यादा सदस्यों को काम करना पड़ रहा है। महंगाई की लगातार बढ़ोतरी से घर का खर्च चलाना मुश्किल होता जा रहा है। पिता के साथ साथ माँ को भी 12 - 12 घंटे काम पर रहना पड़ता है। 
घर में बच्चों का अकेला होना उन्हें आजादी देता है। पारिवारिक निगरानी की कमजोरी की वजह से किशोरों की संगत और रुचि में बदलाव देखने को मिल रहा है। मजबूरन ही सही पर बच्चों को समय न देने, निगरानी न रख पाने की वजह से अच्छे परवरिश की कमी दिख रही है। और यूथ अपने मकसद से भटक रहे हैं।

लेखक:
प्रदीप चौहान
अध्यापक, कवि व सिटीजन जर्नलिस्ट

बुधवार, 16 सितंबर 2020

बेरोज़गार हो गए अख़बार बाँटने वाले।: प्रदीप चौहान




कोरोना के डर, डिजिटल जुड़ाव और लोक़डाउन के बाद अख़बारों की कम होती माँग की वजह से हज़ारों अख़बार बाँटने वाले, बेरोज़गार हो गए हैं। 

सुबह की भोर में जब चकाचौंध दिल्ली, सबसे प्यारी नींद के आग़ोश में सो रही होती है। उसी भोर में कुछ किशोर साइकिल की हैंडल पर टोकरी और थैले लिए निकल जाते हैं अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाने। अख़बारों के थोक मूल्य पर मिलने वाले सेंटरों पर पहुँचकर, अलग अलग कम्पनियों के अख़बार ख़रीदते हैं। मुख्य पन्नो के बीच सप्लिमेंटरी पन्ने भरते हैं। और मालिक की निगरानी मे गिनकर अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी लेकर चल पड़ते हैं। 

साइकिल चलाते-चलाते किसी के दरवाज़े तो किसी की बहुमंज़िली बालकनियों में रबड़ से लपेटे अख़बार फेंकते हैं। गिनती के अख़बारों की ज़िम्मेदारी ऐसी की निशाना हमेशा सटीक ही लगता है। 


चाहे कड़ाके की ठंड हो या तेज़ बारिश, रविवार हो या कोई राष्ट्रीय अवकाश। दिवाली और होली के बासी दिन के अलावा, इनके लिए कोई छुट्टी नहीं होती। 

हर दिन दो से तीन घंटे के काम के बाद, ज़िम्मेदारी और अख़बारों की संख्या के आधार पर 800/- से लेकर 1500/- रुपये तनख़्वाह मिलती है। जिसके लिए ये मेहनती जोशिले नौजवान काम करते हैं।


ज़्यादातर झुग्गी बस्तियों में रहने वाले किशोरों के लिए अख़बार बाँटना मुख्य पार्ट टाइम काम है जिसे करके वो अपने ट्यूशन की फ़ीस देते हैं। अपना जेब ख़र्च चलाते हैं। और परिवार चलाने में आर्थिक मदद करते हैं। 


प्रधानमंत्री द्वारा लिए गए शुरुवाती 21 दिन के लॉकडाउन के फ़ैसले के मद्देनज़र नेहरू प्लेस जैसे कई अख़बार सेंटरों के वेंडर्स असोसीशन ने यह फ़ैसला लिया की लॉकडाउन में कोई भी अख़बार का काम नहीं करेगा। सरकार के  भारत बंद के फ़ैसले का सम्मान किया जाएगा। और ऐसा ही हुआ।


हालाँकि सरकारों ने अख़बार के काम कोजरुरी सेवाकी श्रेणी में रखा और -पास लेकर काम करने की इजाज़त दी। लेकिन हर मोड़, हर चौराहे पर हुए सरकारी नाकाबंदी और रेज़िडेंट वेलफ़ेयर असोसिएशन के द्वारा प्रवेश द्वार बंद कर दिए जाने की वजह से, अख़बार बाँटना मुश्किल हो गया। अनेकों हाउसिंग सोसाइटीस ने बाहरी लोगों का प्रवेश रोक दिया।


दूसरी तरफ़ अख़बार से कोरोना फैलने के पुख़्ता सबूत ना मिलने के डबल्यू॰एच॰ओ॰ के बयान के बावजूद भी, भारी संख्या में मासिक अनुबंध पर अख़बार लेने वालों ने, लेना बंद कर दिया। वेंडर्स ने अख़बारों की संख्या कम होने की वजह से अख़बार डालने वाले लड़कों को निकलना शुरू कर दिया। आज हालात ये है की इनमें से लगभग 80% अख़बार डालने वाले बेरोज़गार हो गए हैं।


नेहरु प्लेस के एक वेंडरचौहान नियूज सर्विसेजके अनुसार कोरोना के डर की वजह से लगभग 40% से ज़्यादा रीडर्स ने अख़बार लेना बंद कर दिया है। जिसकी वजह से काम कम हो गया है। इसका असर ये है की वेंडर्स को अपने यहाँ सालों से काम कर रहे लड़कों को मजबूरन निकलना पड़ा है। 


अख़बार बाँटने का काम करने वाले एक युवक ने बताया कीये काम परिवार की आर्थिक मदद और अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए करता था। लोकडाउन की वजह से पिता के पास काम नहीं है और मैं भी बेरोज़गार हो गया हुँ।


अखबार डिलीवरी का काम करने वाले लोगों की बेरोज़गारी किसी को नहीं दिखती है जरुरी सेवा की श्रेणी में होने के बावजूद भी न तो राज्य सरकार और न ही केंद्र की तरफ से किसी तरह का राहत दिया गया। बेरोज़गारों का ये तबका किसी भी गिनती में नहीं आता किसी को इनकी कोई परवाह नहीं 

पुरे दिल्ली में एक सौ से ज़्यादा सेंटर्स हैं जहाँ लगभग सभी अख़बार थोक क़ीमत पर मिलते हैं। हर सेंटर पर लगभग 100 से ज़्यादा वेंडर्स आते थे। हर वेंडर के पास दो से तीन अख़बार बाँटने वाले काम करते थे। और लगभग सभी वेंडर्स ने अपने यहाँ काम करने वालों को मजबूरन हटाया है। हज़ारों की संख्या में अख़बार डालने वाले बेरोज़गार हो गए हैं। 

गुरुवार, 18 जुलाई 2019

झुग्गी-बस्तियों में शिक्षा के विकास में दीपालय ने पुरे किये अपने 40 साल


Deepalaya Founders' Day

16 जुलाई, 40 साल के युवा बने दीपालय परिवार के लिए एक बड़ा दिन था। इस ख़ास अवसर को परिवार ने  बहुत उत्साह और उल्लास से मनाया। वायु सेना के सभागार, सुब्रतो पार्क, धौला क़ुंआ में सामाजिक बदलाव में मील का पत्थर साबित हुए दीपालय की 40 साल की यात्रा को धूमधाम से मनाया गया। हजारों की संख्या में स्टाफ, विद्यार्थी, स्पोंसर्स, डोनर्स, बोर्ड मेंबर्स और दीपालय समर्थक मौजूद रहे। 

समारोह की अध्यक्षता जाने-माने नाटककार प्रो. श्री ओमचेरी एन एन पिल्लई ने किया। मुख्य अतिथि केंद्रीय मंत्री श्री वी मुरलीधरन थे। सेवानिर्वित आई ए एस श्रीमती रेवा नय्यर, व अन्य सम्मानित अतिथि मौजूद रहे।  कई न्यूज़ चैनल्स और अख़बारों के संवाददाता भी अपनी टीम के साथ कार्यक्रम के कवरेज के लिए मौजूद रहे।

कार्यक्रम की शुरुवात मिस एलिज़ाबेथ फिलिप के शास्त्र वाचन और मिस जिन्सी और मिस शालिनी के स्वागत सन्देश से किया गया। मुख्य अतिथियों के आगमन पर दीप प्रज्वलित करने के उपरांत श्री ए जे फिलिप (सेक्रेटरी एंड चीफ एग्जीक्यूटिव) के  स्वागत भाषण, प्रोफेसर ओमचेरी एन एन पिलइ के भाषण और मुख्य अतिथि के व्याख्यान के द्वारा दीपालय के पिछले 40 वर्षों की यात्रा, चुनौतियों और उपलब्धियों को विस्तारपूर्वक बताया गया। 

जिसमे ये बात निकल कर आई कि दिल्ली में काम कर रहे सात केरलवासी 1979 में 2500 रुपये के निवेश के साथ दीपालय शुरू करने के लिए आए थे। दीपालय की शुरुआत पांच छात्रों और एक शिक्षक के साथ की गई थी। पिछले चालीस वर्षों में, लगभग 3.5 लाख छात्रों ने दीपालय के स्कूलों में अध्ययन किया है। उन छात्रों का भारी बहुमत समाज के सबसे आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों से था। उनमें से ज्यादातर झुग्गियों या झुग्गी-बस्तियों में रहते थे। यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि अगर दीपालय नहीं होता, तो उनमें से कई स्कूल के अंदर नहीं दिखते। आज, वे सभी जीवन में अच्छा कर रहे हैं, उनमें से कुछ ही दीपालय में उच्च पदों पर आसीन हैं।

सांस्कृतिक कार्यक्रमों में एक तरफ गायन के क्षेत्र में प्रतिभावान विद्यार्थी और अध्यापकों ने सरस्वती वंदना गाकर सभा में मौजूद हजारों दर्शकों को मन मोह लिया तो दूसरी तरफ दीपालय परिवार के शिक्षक गायक हिमांशु तथा पूर्व विद्यार्थी व गायक विशाल गुप्ता और सुमित डोगरा ने अपनी गायकी से सबको झूमने पर मजबूर कर दिया।  इसी बिच सोवेनियर नामक किताब का वोमोचन किया गया। 

सामाजिक बदलाव को ध्यान में रखते हुए मलाला थीम के ऊपर स्किट और डांस, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ थीम पर आधारित नृत्य और जुर्म की और बढ़ते युवा नामक नाटक प्रस्तुति ने समाज को सन्देश दिया और सबका मन मोह कर जोरदार तालिया बटोरी।

सभा में मौजूद दर्शकों के लिए एक तरफ मुख्य आकर्षक रहे दीपालय स्पेशल यूनिट के शारीरिक चुनौतियों वाले स्पेशल बच्चे जिन्होंने समावेशी शिक्षा पर आधारित डांस प्रश्तुत किया। वही दूसरी तरफ वोकेशनल ट्रेनिंग के विद्यार्थियों के द्वारा प्रस्तुत फ्यूजन डांस की उम्दा कलाबाजियों ने दर्शकों को दांतो तले उंगलिया चबाने पर मजबूर कर दिया। 

समाज में शैक्षिक बेहतरी के खास मकसद के लिए वित्तीय दानकर्ताओं के सम्मान के बाद श्री टी के मैथ्यू (फॉउन्डिंग मेंबर और पूर्व सेक्रेटरी एंड चीफ एग्जीक्यूटिव) की बायोग्राफी का विमोचन किया गया।  और अंततः मुख्य क्रियाशील एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर मिस जसवंत कौर के वोट ऑफ़ थैंक्स के बाद इस भव्य उत्सव का समापन किया गया। 

नशे की दलदल में डूबता बचपन : प्रदीप चौहान

दिल्ली की स्लम बस्तियों में दस-दस साल के बच्चे, छोटी उम्र में गांजा, शराब व अन्य बुरी आदतों के शिकार हो रहे हैं। जिस उम्र में ज्यादातर बच्चे...